Report by : CWN Desk
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भाईदूज 2025: यम द्वितीया पर च्यूड़े का क्या महत्व? जानें भाई-बहन के इस पवित्र पर्व की कथा

हल्द्वानी समेत उत्तराखंड में भाईदूज (यम द्वितीया) पर च्यूड़ा कूटने की खास परंपरा। जानें कैसे तैयार होता है यह च्यूड़ा और क्या है यम-यमुना से जुड़ी वह पौराणिक कथा, जो भाई को देती है यमलोक से मुक्ति का वरदान।

दीपावली पर्व का समापन भाई-बहन के अटूट प्रेम के प्रतीक भाईदूज के साथ होता है, जिसे ‘यम द्वितीया’ भी कहा जाता है। हल्द्वानी समेत उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में इस पर्व की एक विशेष परंपरा है— च्यूड़े (चावल के पोहे) का महत्व। आज, यानी यम द्वितीया के दिन, बहनें अपने भाई के सिर पर ये च्यूड़े रखती हैं, जो उन्हें लंबी उम्र और सुरक्षा का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा भाई-बहन के रिश्ते को और भी मधुर बना देती है।


इस पर्व के लिए खास तौर पर च्यूड़े तैयार किए जाते हैं। पारंपरिक रूप से, गोवर्धन पूजा के दिन धान को भिगोकर और फिर भूनकर ओखली में कूटा जाता है, जिससे च्यूड़े बनते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग मशीन से बने च्यूड़ों की जगह हाथ से कूटे गए च्यूड़ों को ही प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि यह धार्मिक और सांस्कृतिक शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। बहनें इन्हीं च्यूड़ों से भाई का सिर पूजन कर, उनके माथे पर तिलक लगाती हैं और भाई अपनी बहन की आजीवन सुरक्षा का वचन देते हैं।
यम द्वितीया पर्व से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार सूर्य देव की पत्नी संज्ञा की संतानें यमराज और यमुना थीं। जब संज्ञा उन्हें छोड़कर चली गईं, तो यमुना के साथ सौतेला व्यवहार हुआ। इससे दुखी यमराज ने अपनी नगरी ‘यमपुरी’ बसाई। लंबे समय बाद यमराज अपनी बहन यमुना से भूलोक में मिले। यमुना ने अपने भाई का स्नेहपूर्वक स्वागत और भोजन से सत्कार किया। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर यम ने वरदान मांगने को कहा।
यमुना ने तब वरदान मांगा कि जो भाई आज के दिन अपनी बहन के घर आकर भोजन करेगा और यमुना के जल से स्नान करेगा, उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। भाई के वरदान के रूप में यमराज ने इस परंपरा को अमर कर दिया। तब से यह माना जाता है कि भाईदूज पर बहन द्वारा किए गए तिलक और भोजन से भाई को यम का भय नहीं सताता और उसकी अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। यह कथा भाई-बहन के बीच के पवित्र रिश्ते और बहन के प्रेम की शक्ति को दर्शाती है।
भाईदूज का यह त्योहार न सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है, बल्कि यह हमें अपनी लोक संस्कृति से भी जोड़े रखता है। धान की नई फसल से च्यूड़ा बनाने की यह परंपरा दिखाती है कि हमारे त्योहार प्रकृति और आस्था से कितने गहरे जुड़े हुए हैं। इस साल भी सभी भाई-बहनों के लिए यह पर्व सुख, समृद्धि और दीर्घायु लेकर आए।

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