विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ पहाड़ों के पलायन, खाली होते गांवों और बुजुर्गों के अकेलेपन को बखूबी दिखाती है। पढ़ें फिल्म का विस्तृत और खास रिव्यू।
हल्द्वानी। फिल्म ‘पायर’ (पायर यानी चिता) पहाड़ों से हो रहे पलायन, वीरान होते गांवों और वहां अकेले छूट गए बुजुर्गों के जीवन की एक बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाली कहानी है। लेखक-निर्देशक विनोद कापड़ी की यह फिल्म न केवल दर्शकों को एक नए दृष्टिकोण से रूबरू कराती है, बल्कि उन घरों पर लटकते तालों की याद दिलाती है जिनके पीछे कई अनकही और भूली-बिसरी कहानियां दफन होती हैं।
कहानी की शुरुआत एक ऐसे गांव से होती है जहां कुल जमा केवल 10 लोग ही बचे हैं। मुख्य पात्र पदम और उसकी पत्नी तुलसी के पास ले-देकर कुछ बकरियां हैं, जिन्हें वह किसी तरह गांव में रोकने का साधन बनाने की कोशिश करते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उनका सबसे बड़ा डर यह है कि अगर दोनों में से कोई एक पहले चला गया, तो पीछे बचे दूसरे का क्या होगा और उसकी चिता को मुखाग्नि कौन देगा? फिल्म इसी गहरे अकेलेपन और अस्तित्व की लड़ाई को बयां करती है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं। पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी ने बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के बेहद सहज और स्वाभाविक अभिनय किया है। मानस भट्टाचार्य की सिनेमैटोग्राफ़ी और पहाड़ी परिवेश की वास्तविक तस्वीरें इस फिल्म की जान हैं। बिना किसी बनावटीपन के पहाड़ी जीवन की कठिन सच्चाइयों को पर्दे पर उतारना निर्देशक के विजन और मेहनत को साफ दर्शाता है।
‘पायर’ केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के लिए एक गंभीर सवाल है कि विकास की इस अंधी दौड़ में हम अपने बुजुर्गों को कहां छोड़ आए हैं। यह फिल्म हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता की चकाचौंध में हमारे गांव किस तरह वीरान हो रहे हैं। यदि आप भी अपने बुजुर्ग माता-पिता से दूर शहर में रहते हैं, तो यह फिल्म देखने के बाद आपको उनसे मिलने का मन जरूर करेगा।