Report by : CWN Desk
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उत्तराखंड में लोकतंत्र पर खतरा? पीसी तिवारी ने नई SOP को बताया जनविरोधी

उपपा अध्यक्ष पीसी तिवारी ने अधिकारियों से मिलने के लिए जारी नई SOP का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन और तानाशाही करार दिया।

अल्मोड़ा/देहरादून: उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (UPPA) के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने प्रदेश सरकार द्वारा अधिकारियों से मिलने के लिए जारी नई एसओपी (SOP) पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक जनप्रतिनिधि की आपराधिक हरकत की आड़ लेकर आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलना स्वीकार्य नहीं है। तिवारी ने सरकार के इस कदम को “लोक” पर “तंत्र” का हावी होना बताया है।
मामले की पृष्ठभूमि में हाल ही में एक सत्ताधारी विधायक द्वारा बेसिक शिक्षा निदेशक के साथ की गई मारपीट की घटना है। पीसी तिवारी ने इस घटना की घोर निंदा करते हुए दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की। हालांकि, उन्होंने सरकार को घेरे में लेते हुए कहा कि इस एक घटना का बहाना बनाकर पूरे प्रदेश की जनता पर कड़े प्रतिबंध थोपना पूरी तरह से असंवैधानिक और अनुचित है।
नई SOP के तहत अब विकासखंड से लेकर शासन स्तर तक अधिकारियों से मिलने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण, पहचान पत्र सत्यापन और उद्देश्य का पूर्व उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया है। तिवारी का तर्क है कि जन आंदोलनों से बने उत्तराखंड राज्य में यदि बेरोजगार युवाओं और भ्रष्टाचार पीड़ितों को अपनी बात रखने के लिए इतनी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ेगा, तो यह लोकतंत्र का अपमान होगा। यह नियम आम नागरिकों को ‘संभावित अपराधी’ की दृष्टि से देखने जैसा है।
उपपा अध्यक्ष ने सामाजिक-राजनीतिक संगठनों और जागरूक नागरिकों से इस मुद्दे पर व्यापक बहस का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र भय से नहीं बल्कि संवाद और विश्वास से चलता है। सरकार को जवाबदेही और पारदर्शिता पर ध्यान देना चाहिए, न कि जनता की आवाज को दबाने वाले अंकुशों पर। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन प्रतिबंधों को वापस नहीं लिया गया, तो यह राज्य की लोकतांत्रिक भावना के लिए घातक सिद्ध होगा।
अंततः, तिवारी ने मांग की है कि अधिकारी पर हमला करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई कर उदाहरण पेश किया जाए। किसी एक की गलती की सजा पूरी जनता को देना न्यायसंगत नहीं है। शासन-प्रशासन को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे स्वयं कानून की मर्यादा का पालन कर रहे हैं। वर्तमान समय की मांग अधिकारों पर अंकुश लगाने की नहीं, बल्कि तंत्र को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने की है।

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