Report by : CWN Desk
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वन पंचायतों को जुर्माना वसूल करने और निकासी अधिकार मिला पहली बार

ईको टूरिज्म को भी मिलेगा बढ़ावा, 10 साल के लिए बनेगा माइक्रो मैनेजमेंट प्लान
देहरादून। देश में वन पंचायतों की एकमात्र व्यवस्था वाले मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में अब इनके सशक्तीकरण पर सरकार ने ध्यान केंद्रित किया है। कैबिनेट ने इसके लिए वन पंचायत नियमावली में संशोधन के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी है।
राज्य में वन पंचायतों की संख्या 11217 है। इनके मध्य सीमा समेत अन्य विवाद सामने आने पर इसके निस्तारण को वन और राजस्व विभाग की संयुक्त समिति गठित की जाएगी। समिति के निर्णय को डीएफओ व डीएम के पास चुनौती भी दी जा सकेगी।
यही नहीं, वन पंचायतों के अधीन वन क्षेत्रों में उनके द्वारा जड़ी-बूटी व सगंध पादपों की खेती करने उन्हें इनके दोहन से लेकर विपणन तक का अधिकार भी दिया गया है। इसके अलावा अन्य कई प्रविधान भी किए गए हैं। वन पंचायतों को वन अपराध करने वालों से जुर्माना वसूल करने का अधिकार भी पहली बार धामी सरकार ने दिया है।
वन पंचायतों के सशक्तीकरण के दृष्टिगत लंबे समय से कसरत चल रही थी। गुरुवार को कैबिनेट की बैठक में इसके लिए वन पंचायत नियमावली में संशोधन से संबंधित प्रस्ताव रखा गया, जिसे चर्चा के बाद स्वीकृति दे दी गई। वन पंचायतों के अधीन क्षेत्र को लेकर अक्सर राजस्व व वन विभाग के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों के निस्तारण को तहसीलदार और सहायक वन संरक्षक की अध्यक्षता में संयुक्त समिति गठित की जाएगी।
इसके अलावा यदि वन पंचायत किसी नगर निकाय क्षेत्रांतर्गत है तो वहां भी इसके निस्तारण को नौ सदस्यीय समिति गठित की जाएगी। इस समिति में नगर निकाय के अध्यक्ष द्वारा आठ सदस्य नामित किए जाएंगे, जबकि जैव विविधता बोर्ड का एक सदस्य इसमें शामिल होगा। इन समितियों के निर्णय को 30 दिन के भीतर चुनौती देने का प्रविधान भी किया गया है। यदि वन पंचायत का विषय वन विभाग के क्षेत्रांतर्गत का है तो डीएफओ और सिविल सोयम के अंतर्गत होने पर डीएम के यहां अपील की जा सकेगी।
सरकार ने वन पंचायतों में हर्बल मिशन प्रारंभ करने का निश्चय किया है। इसके तहत प्रथम चरण में पांच सौ वन पंचायतों के माध्यम से उनके अधीन वन क्षेत्रों में जड़ी-बूटी और सगंध पादपों की खेती कराने का निर्णय लिया गया है। यह योजना छह सौ करोड़ से अधिक की है। इसे देखते हुए मांग उठ रही थी कि वन पंचायतें यदि जड़ी-बूटी व सगंध पादपों की खेती करती हैं तो उन्हें इसकी निकासी का अधिकार मिलना चाहिए।
अब वन पंचायत नियमावली में प्रविधान किया गया है कि संबंधित वन पंचायतें जड़ी-बूटी व सगंध पादपों का दोहन करेंगी, बल्कि इनका विपणन भी उन्हीं के जिम्मे होगा। इन्हें एक से दूसरे स्थान पर ले जाने को वन पंचायतें निकासी दे सकेंगी।
वन पंचायत नियमावली में इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया है कि वन पंचायतें अब अपने अधीन वन क्षेत्रों में ईको टूरिज्म की गतिविधियों को भी बढ़ावा देंगी। किसी क्षेत्र को ईको टूरिज्म की दृष्टि से विकसित करने पर इसके संचालन, रखरखाव आदि की जिम्मेदारी उन्हें दी गई है।
वन पंचायतों के क्षेत्रों में होने वाले कार्यों के दृष्टिगत अब उनका माइक्रो मैनेजमेंट प्लान 10 वर्ष के लिए बनेगा। पहले यह प्लान पांच वर्ष के लिए बनता था। यही नहीं, अब नियमावली में प्रविधान किया गया है कि माइक्रो मैनेजमेंट प्लान प्रमुख वन संरक्षक वन पंचायत के स्तर पर गठित समिति के माध्यम से अनुमोदित किया जाएगा। पहले यह वन संरक्षक के स्तर पर अनुमोदित किया जाता था।
वन पंचायतों के प्रतिनिधियों के लिए एक और महत्वपूर्ण प्रविधान किया गया है। नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत के अलावा क्षेत्र व जिला पंचायतों में भी वन पंचायतों से सदस्य नामित किए जाएंगे। यद्यपि, उन्हें मताधिकार का अधिकार नहीं होगा, लेकिन सदन में वे अपनी बात रख सकेंगे। वन पंचायतों को सीएसआर फंड अथवा अन्य स्रोतों से मिली धनराशि को उनके बैंक खाते में जमा करने का अधिकार देने की व्यवस्था नई नियमावली में की गई है।

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