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हल्द्वानी

कोटाबाग में युवक की मौत: क्या लाइनहाजिर से पूरी हो जाती है इंसाफ की कहानी?

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कोटाबाग (नैनीताल)। “मेरे बेटे ने क्या गलत किया था…?” यह सवाल बिशन सिंह नगरकोटी की आंखों से झरते आंसुओं में डूबा हुआ है। उनके बेटे कमल की जान चली गई, और वो भी उन हाथों से, जिनसे जनता को सुरक्षा की उम्मीद होती है।
कमल की मौत का सिलसिला उस दिन शुरू हुआ, जब उसे किसी मामले में पूछताछ के लिए कोटाबाग पुलिस चौकी ले जाया गया। परिवार का आरोप है कि चौकी में कमल को घंटों तक पीटा गया, अपमानित किया गया। दर्द से टूटा कमल चौकी से लौटा, तो उसने जहर खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
कमल का सपना था अपने मां-बाप का सहारा बनने का। लेकिन उस रात उसके सपनों के साथ उसके जीवन की भी राख बन गई। बिशन सिंह जब स्थानीय विधायक बंशीधर भगत से मिलने पहुंचे, तो सिर्फ एक सवाल लेकर खड़े थे — “क्या मेरे बेटे की मौत का जवाब बस इतना है कि दो पुलिसकर्मियों को लाइनहाजिर कर दिया जाए?”
प्रशासन ने चौकी प्रभारी और एक कांस्टेबल को लाइनहाजिर कर दिया है। पर क्या यही इंसाफ है? क्या इतनी सी कार्रवाई से उन तमाम जख्मों पर मरहम लग जाएगा जो एक पिता के दिल में हमेशा के लिए उतर गए हैं?
कमल की मौत सिर्फ एक परिवार का दुःख नहीं है। यह एक सवाल है उस तंत्र पर, जो जनता की रक्षा का दावा करता है। हर बार इस तरह की घटनाओं में कुछ पुलिसकर्मी लाइनहाजिर होते हैं, जांच की घोषणा होती है, लेकिन इंसाफ की राह वहीं अटक जाती है।
बिशन सिंह की पुकार उन तमाम मां-बाप की आवाज है, जिनके बेटे व्यवस्था की बर्बरता के शिकार हो जाते हैं। आज उनका बस इतना कहना है — “मेरे बेटे को तुम नहीं बचा पाए, पर उसके लिए इंसाफ दो, ताकि और किसी बाप को अपने कंधों पर अपने ही बेटे की लाश न उठानी पड़े।”
सवाल यही है — क्या लाइनहाजिर से पूरी हो जाती है इंसाफ की कहानी?

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साभार: वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश नैनवाल की फेसबुक वॉल से

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