हल्द्वानी
हल्द्वानी में लोकपर्व हरेला की धूम, सर्वार्थसिद्धि योग में विधि-विधान से बोया गया सात अनाज
उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकपर्व हरेला को लेकर हल्द्वानी में भारी उत्साह है। सर्वार्थसिद्धि और बुधादित्य योग में महिलाओं ने शकुनाखर गीत गाकर सुख-समृद्धि की कामना के साथ हरेला बोया।
हल्द्वानी: उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति, प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक लोकपर्व ‘हरेला’ मंगलवार को हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों में बेहद हर्षोल्लास के साथ शुरू हो गया है। शहर की अमरावती कॉलोनी, जगदंबा नगर, मुखानी, काठगोदाम और ग्रामीण क्षेत्र गौलापार समेत तमाम इलाकों में लोगों ने पारंपरिक विधि-विधान से अपने-अपने घरों के देवालयों में हरेला बोया। इस दौरान हर घर में लोक संस्कृति की अनूठी छटा देखने को मिली।
इस पावन पर्व की शुरुआत के मौके पर कुमाऊं की लोक परंपरा के अनुसार महिलाओं ने पारंपरिक ‘शकुनाखर’ गीत गाए। इन मांगलिक गीतों के जरिए महिलाओं ने अपने परिवार, समाज और पूरे देश की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की। ज्योतिषी अशोक वार्ष्णेय के अनुसार, इस वर्ष सौर मास श्रावण का यह पावन हरेला मंगलवार को सर्वार्थसिद्धि, शोभन और बुधादित्य योग के दुर्लभ संयोग में बोया गया है, जो बेहद कल्याणकारी माना जा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष गणना के अनुसार, इस विशेष शुभ मुहूर्त में हरेला बोना आगामी फसल उत्पादन और कृषि व्यवस्था के लिए बहुत शुभ संकेत माना जाता है। आगामी 16 जुलाई को कर्क संक्रांति के साथ ही सावन महीने की विधिवत शुरुआत होगी और इसी दिन बड़े ही हर्षोल्लास के साथ हरेले का काटा और पूजा जाएगा। इस पर्व के तहत साफ मिट्टी को शुद्ध करके रिंगाल (बांस की एक प्रजाति) की टोकरी या मिट्टी के पात्रों में सात अलग-अलग तरह के अनाज बोए जाते हैं।
इन सात अनाजों में मुख्य रूप से गेहूं, जौ, धान, मक्का, गहत, सरसों और उड़द शामिल होते हैं। इसके साथ ही मिट्टी से देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां (डिक्कर) बनाकर उनकी स्थापना की जाती है। सात से दस दिनों के भीतर जब यह पौधा पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो सावन की संक्रांति के दिन इसे काटकर देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद स्वरूप इस हरेले को सभी के सिर पर (शिरोधारण) रखकर खुशहाली की दुआ देते हैं।
