शिक्षा
डॉ. भट्ट की ‘सुपर क्लास’: जहां फीस नही सिर्फ मिठाई चलती है
- 650 छात्रों को फौज में तो 100 से अधिक को अन्य सरकारी नौकरी में करवा चुके हैं भर्ती
धानाचूली (नैनीताल)। ऋतिक रोशन की सुपरहिट फिल्म सुपर 30 आपने देखी होगी, जिसमें आनंद कुमार जैसे शिक्षक आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाकर आईआईटी में पहुँचाते हैं। अब ओखलकांडा के डालकन्या निवासी और यहीं राजकीय इंटर कॉलेज में तैनात हिंदी के प्रवक्ता डॉ. मुरली मनोहर भट्ट को देखिए हकीकत के आनंद कुमार, जिनकी क्लासरूम किसी सिनेमा की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि जज़्बे और ज़मीनी संघर्ष की सच्ची मिसाल है।
डा. भट्ट पिछले बीस वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। पीटीए शिक्षक से सरकारी प्रवक्ता बनने तक का सफर उन्होंने पार किया, लेकिन उनका असली सपना था गांव के उन बच्चों को ऊपर उठाना, जिन्हें किताबें तक मयस्सर नहीं होतीं।
उन्होंने अपने स्वर्गीय पिताजी चंद्रमणि भट्ट के नाम पर एक नि:शुल्क कोचिंग एवं परामर्श केंद्र की शुरुआत की, जहाँ वे सेना, पुलिस, सहायक प्रवक्ता समेत विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की मुफ्त तैयारी करवाते हैं।
उनके सिखाए 650 से अधिक छात्र भारतीय सेना में भर्ती हो चुके हैं और 100 से अधिक सरकारी नौकरियों में चयनित होकर गांव, समाज और शिक्षक का नाम रोशन कर चुके हैं।
“सुपर 30 में जैसे आनंद कुमार कहते हैं ‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, वही राजा बनेगा जो हकदार होगा’, वैसी ही सोच डॉ. भट्ट की है।”
उनका मानना है कि “टैलेंट हर घर में है, लेकिन हर जेब में कोचिंग की फीस नहीं होती।” यही सोच उन्हें आज “पहाड़ का सुपर 30 गुरु” बनाती है।
पिथौरागढ़, चम्पावत जैसे दूरस्थ जिलों से जो छात्र पढ़ने आते हैं, उनके लिए डॉ. भट्ट रहने-खाने की पूरी व्यवस्था भी नि:शुल्क करते हैं। कई छात्रों को अपने गांव में कमरों का बंदोबस्त, तो कुछ को खुद के हाल में ठहराना ये सब कुछ बिना किसी फीस के, बिना किसी शर्त के होता है।
“मेरी फीस तब मिलती है जब कोई छात्र मिठाई का डिब्बा और नियुक्ति पत्र लेकर मेरे पास आता है,” वे मुस्कुराते हुए कहते हैं।
हाल ही की अग्निवीर व पुलिस भर्ती परीक्षा के लिए भी उन्होंने 60 छात्रों को तैयार किया है।
वे कहते हैं “मैं उन्हें सिविल सेवा के लिए अभी नहीं पढ़ा सकता, लेकिन इतना जरूर सिखा सकता हूँ कि वे वहां तक का सफर खुद तय कर सकें।”
वे अपने इस सफ़र का श्रेय अपने बड़े भाई पूर्व सैनिक केशव दत्त भट्ट को देते हैं और भीगी पलकों और रूँधे गले से कहते हैं की जान मैं पांचवीं में था पिताजी चल बसे लेकिन बड़े भाई ने हिम्मत नहीं हारी और खूब मन से पढ़ाई करने को प्रेरित किया एक कच्चे मकान में रहने के बावजूद भाई ने कोई कमी नहीं की और बस यहीं से सोच किया था कि मैं भी अपने क्षेत्र में हर छात्र को उसका बड़ा भाई बनकर पढ़ाऊँगा और भविष्य के लिए तैयार करूँगा।
