नैनीताल
नैनीताल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बच्चे के DNA टेस्ट की मांग खारिज, प्राइवेसी सर्वोपरि
नैनीताल हाईकोर्ट ने बच्चे के DNA परीक्षण की अपील खारिज की। कोर्ट ने कहा- व्यभिचार साबित करने के लिए मासूम की गरिमा और प्राइवेसी से समझौता नहीं किया जा सकता।
नैनीताल। हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्चे के डीएनए (DNA) परीक्षण की मांग को लेकर दायर अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बच्चों के डीएनए टेस्ट के निर्देश सामान्य तौर पर नहीं दिए जा सकते। कोर्ट के अनुसार, कानून वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की गरिमा, वैधता और गोपनीयता की कड़ी सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता डीएनए जांच की मांग के लिए कोई भी आवश्यक कानूनी आधार स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसी कारण खंडपीठ ने इस मामले में पारिवारिक न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश को बरकरार रखने का निर्णय लिया।
यह मामला नैनीताल के एक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसने साल 2025 में पारिवारिक न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत अपनी पत्नी पर व्यभिचार और वैवाहिक दुराचार के गंभीर आरोप लगाए थे। इन आरोपों को वैज्ञानिक रूप से साबित करने के लिए उसने बच्चे के डीएनए जांच की गुहार लगाई थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 का विशेष रूप से उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को कानून स्वतः ही वैध मानता है। इस कानूनी धारणा को केवल तभी चुनौती दी जा सकती है, जब यह ठोस रूप से साबित हो कि पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध संभव नहीं थे।
अदालत ने अंत में दोहराया कि डीएनए परीक्षण जैसे संवेदनशील आदेशों को सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। ऐसे परीक्षणों की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब मामले में बहुत मजबूत और ठोस कानूनी आधार मौजूद हो। कोर्ट ने मासूम की गोपनीयता और सामाजिक प्रतिष्ठा को माता-पिता के आपसी विवादों से ऊपर रखा है।
