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नई दिल्ली

दिल्ली में गूंजी कुमाऊँ की लोक संस्कृति, सातों-आठों में नाटक मंचन कर कलाकारों ने जमाया रंग

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  • दिल्ली सरकार के सौजन्य से कलश कलाश्री सोसायटी की ओर से किया गया मंचन
  • भाद्रपक्ष में बागेश्वर, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों में मनाया जाता है गवरा लोक पर्व

नई दिल्ली। उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाने वाला लोकपर्व ‘सातों-आठों’ का राजधानी दिल्ली में शानदार मंचन किया गया। गढ़वाली, कुमाऊंनी एवं जौनसारी अकादमी (दिल्ïली सरकार) के सौजन्य और कलश कलाश्री सोसायटी की ओर से तैयार किया गया ‘सातों आठों’ नाटक का रविवार शाम को दिल्ïली के मुक्तधारा सभागार में मंचन किया गया। नाटक का आलेख और परिकल्पना कलश कलाश्री के अध्यक्ष के एन पाण्डेय और निर्देशन अखिलेश भट्ट द्वारा तैयार किया गया था।

कुमाऊं के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों में मनाया जाने वाला ‘सातों आठों’ पर्व बेटी की विदाई का पर्व है, जिसमें माता गौरा को पति महेश के साथ ससुराल के लिए विदा किया जाता है। इस पर्व की शुरुआत भाद्रपद मास (अगस्त-सितंबर) की पंचमी तिथि से होती है। इसे बिरुड पंचमी भी कहते हैं। बिरुड़ पंचमी के दिन घर की महिलाएं व्रत धारण करके, सच्चे मन और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति के साथ तांबे के एक बर्तन में पांच या सात अनाजों मक्ïका, गेहूं, गहत, उड़द, चना भिगोकर मंदिर के समीप रखते हैं। इन अनाजों को लोकल भाषा में बिरुडे या बिरुडा भी बोला जाता है। ये अनाज औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। महिलाओं का व्रत 5 दिन तक चलता है। इन्हीं अनाजों को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। सप्तमी के दिन गौरा और महेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और अष्टमी के दिन गांव वाले भरे मन व नम आंखों से अपनी बेटी गमरा (गौरा) को जमाई राजा महेश्वर के साथ ससुराल को विदा करते हैं। साथ ही अगले वर्ष फिर से गौरा के अपने मायके आने का इंतजार करते हैं।

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ऐसे आयोजनों को बढ़वा देगी अकादमी- कुलदीप भंडारी

इस अवसर पर गढ, कुमाऊँ, जौनसार अकादमी के सचिव संजय कुमार गर्ग, उपाध्यक्ष डॉ कुलदीप भंडारी, समेत कई गण्यमान लोग मौजूद रहे। उपाध्यक्ष डा. कुलदीप भंडारी और सचिव संजय गर्ग ने कहा कि इस तरह के साामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक नाटकों को किए जाने की आवश्यकता है जिससे हमारी संस्कृति बची रहेगी। हमारा प्रयास रहेगा कि अकादमी ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देगी। उन्होंने कहा कि कलश कलाश्री द्वारा प्रदर्शित किया गया सातों आठों नाटक बहुत खास था, इसमें हमें अपनी संस्कृति, प्रभु के प्रति आस्था, श्रद्धा और भक्तिभावना के साथ ही अपने परिवार के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों का भी अहसास होता है।

अपनी संस्कृति को बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी ~ के एन पाण्डेय

कलश कलाश्री के अध्यक्ष के एन पाण्डेय ने कहा कि अपनी संस्कृति को बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी बनती है। कलश कलाश्री विगत कई वर्षो से उत्तराखण्ड की संस्कृति, कला, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के तौर पर कार्य कर रही है। इसी कड़ी में अपनी संस्कृति को बचाए रखने और इसके प्रचार प्रसार के लिए सातों आठों नाटक तैयार किया गया। उन्होंने अपना उदï्बोधन कुमाऊंनी भाषा में दिया। उन्होंने दर्शकों द्वारा नाटक को पसंद करने और अकादमी की ओर से आगे को भी ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए इन सबको आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद किया।

त्यौहार का महत्व जानना भी जरूरी- अखिलेश

नाटक के निर्देशक अखिलेश भटï्ट ने भी ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हम त्यौहार और पर्व तो मनाते हैं लेकिन उन्हें मनाते क्यों हैं, किस पर्व का क्या महत्व है, इस बात से अनजान रहते हैं। हमें त्यौहारों के महत्व को जानना भी जरूरी है। ऐसे आयोजनों से हम अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने और उसे बचाए रखने में कामयाब हो सकते हैं।

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इन लोगों ने निभाई अभिनय की भूमिका

गौरा-महेश की स्तुति पर आधारित कुमाऊंनी भाषा के इस नाटक में गौरा-महेश का किरदार ममता कर्नाटक और अखिलेश भट्ट ने निभाया। ब्राहमण वीणभाट का अभिनय के एन पाण्डेय, पंडित का अभिनय भगत सिंह नेगी, बुजुर्ग महिला व छोटी बहू की मां का किरदार गीता नेगी, बड़ी बहु का किरदार धन लक्ष्मी, मजली बहू का किरदार संगीता सुयाल, छोटी मजली बहु का किरदार योगिता जोशी, सबसे छोटी बहु का किरदार उमा जोशी, सबसे बड़ा पुत्र का किरदार चंदन सौटियाल, मजला पुत्रो का किरदार केसी कोटियाल व दीवान कार्की, कास्टूयूम व्यवस्था और नृत्य में भगवत मनराल और मानसी भट्ट ने अपनी भूमिका निभाई। वहीं ग्रामीणों की भूमिका में राहुल भट्ट, योगेश बवाड़ी, गुंजन बवाड़ी व मानसी भट्ट ने अभिनय किया। सातों आठों नाटक में इन सभी कलाकारों द्वारा किए गए अभिनय को दर्शकों ने बहुत पसंद किया।

वहीं पागल के अभिनय में भूपाल बिष्ट, संगीत नियंत्रण में नरेन्द्र कपरवाण, संगीत ध्वनि नियंत्रण में राहुल चौहान, अनुवाद- प्रकाश नियंत्रण में जीवन पाण्डेय और मंच व्यवस्था में प्रेम प्रकाश का विशेष योगदान रहा। नृत्य और ग्रामीण की भूमिका में तुलिका का योगदान सारानीय रहा।

साभार: फोटो और वीडियो दिल्ली से दीवान कार्की

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