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हरिद्वार

‘लगती किश्ती वही किनारे, जो लहरों के वार सहे’

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पारिजात’ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच कवि गोष्ठी
हरिद्वार।
मौसम के द्वार पर ऋतुराज बसंत के दस्तक देते ही नगर के नामचीन कवियों के शब्द और स्वर दोनों ही परवान चढ़ने लगे हैं। पारिजात साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की कवि गोष्ठी में उपस्थित कवियों ने अपनी बहुमुखी रचनाओं से श्रोताओं को बारम्बार वाह-वाह करने को मजबूर किया।


     वीणापाणि मातु सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन व पुष्पार्पण के साथ सम्पन्न हुई इस गोष्ठी में प्रेम शंकर शर्मा ‘प्रेमी’ ने ‘प्रयागराज सनातन का धर्म योजन प्रताप, महाकुम्भ से आएगा नवजीवन इतिहास’ कहकर प्रयागराज महाकुंभ का महिमा मंडन। वरिष्ठ गीतकार भूदत्त शर्मा ने अपना गीत ‘रात के पीछे भी कल था रात के आगे भी कल है, चाँद आए या ना आए रात का आना अटल है’ रखा। साधुराम पल्लव ने ‘मन को पंख लगा दो आसमान छोटा पड़ जाए खुशियों से संसार पाट दो दुखों का टोटा पड़ जाए’ कह कर मंगलकामना की।
      चेतना पथ के सम्पादक व वरिष्ठ कवि अरुण कुमार पाठक ने ‘लगती किश्ती वही किनारे, जो लहरों के वार सहे, बन गुलाब महकता वो ही, जो काटों के साथ रहे’ सुनाकर थके, हारे और टूटे मन में आशा व विश्वास का संचार किया।
युवा कवियित्री अपराजिता उन्मुक्त ने ‘प्राण का आधार है जीवन किया साकार है, अंतिम साँसों का सार हो एकमात्र देश भारत’ के साथ राष्ट्र वंदन किया। राज कुमारी राजेश्वरी ने ‘माँ के वीर बाँकुरे बेटे अगर नहीं हथियार उठाते, हाथ जोड़ने भर से रखा।  कभी न देश छोड़कर जाते’ कह कर देश के वीर शहीदों की शहादत को सलाम किया। परिक्रमा साहित्यिक मंच के अध्यक्ष मदन सिं यादव ने ‘इस ऋतु की शान निराली है, हर दिशा हुई मतवाली है’ के साथ ऋतुराज बसंत का स्वागत किया।
      डा. कल्पना कुशवाह ‘सुभाषिनी ने ‘मन्नतों के धागे में मैं था उसको पिरो दिया, प्यार के हर एहसास को मैंने था उसमें संजो दिया’ तथा आशा साहनी ने ‘कोई गीत लिखा न मैंने पढ़-लिख कर अखबारों, से सारे गीत लिखे हैं मैंने इन बिखरे किरदारों से’ के साथ अपने मन की व्यथा-कथा परोसी, तो युवा जोश के कवि अरविंद दुबे ने ‘जीयो और जीने दो का इकलौता मंत्र हमारा है, इसीलिए सनातन धर्म हमें प्राणों से ज्यादा प्यार है’ के साथ गोष्ठी को अध्यात्मिक दिशा प्रदान की। इसके अतिरिक्त बिजनौर से पधारे कवि कर्मवीर सिंह, अनिल कौशिक और आरव कौशिक ने भी काव्य पाठ किया।

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