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हल्द्वानी

घुघुतिया पर्व 2026: कुमाऊं में उत्तरायणी की धूम, बच्चों ने पहनी घुघुत की माला

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उत्तराखंड के कुमाऊं में लोकपर्व घुघुतिया (उत्तरायणी) हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जानें कौवों को बुलाने की परंपरा, घुघुत माला का महत्व और पौराणिक कथा।

हल्द्वानी। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मकर संक्रांति के साथ ही लोकसंस्कृति का अनूठा पर्व ‘घुघुतिया’ (उत्तरायणी) पूरे उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही ऋतु परिवर्तन की खुशी में यह त्योहार प्रकृति और पक्षियों के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ सहित पूरे कुमाऊं में आज सुबह से ही उत्सव का माहौल है।
घुघुतिया पर्व की सबसे बड़ी विशेषता “घुघुत” नामक पकवान है। इसे गेहूं के आटे, गुड़ और घी के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इन पकवानों को अनार के फूल, डमरू, तलवार और सूरज जैसी विभिन्न आकृतियों में ढाला जाता है। बच्चों के लिए इन घुघुतों को धागे में पिरोकर एक सुंदर माला बनाई जाती है, जिसमें संतरा और माल्टा जैसे स्थानीय फल भी शामिल होते हैं।
ज्योतिर्लिंग जागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज ने इस पर्व का महत्व बताते हुए कहा कि यह उत्सव सह-अस्तित्व का संदेश देता है। आज के दिन से ही शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत मानी जाती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति की सुबह बच्चे छतों पर जाकर कौवों को आमंत्रित करते हैं और उन्हें अपनी माला से घुघुत खिलाते हैं।
इस अवसर पर कुमाऊं के आंगनों में एक विशेष लोकगीत गूंजता है— “काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले…”। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक राजकुमार की जान कौवों की सतर्कता की वजह से बची थी, जिसके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए यह परंपरा शुरू हुई। वहीं, दूसरी मान्यता के अनुसार कौवों को पितरों का प्रतीक मानकर उन्हें भोजन कराया जाता है।
अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में यह पर्व विशेष अनुशासन के साथ मनाया जाता है। घरों में महिलाएं पारंपरिक पकवान बनाती हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। आधुनिकता के दौर में भी घुघुतिया का उल्लास कम नहीं हुआ है। यह पर्व हमें सिखाता है कि कैसे मनुष्य, प्रकृति और पक्षियों का रिश्ता सदियों से अटूट बना हुआ है।

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