हल्द्वानी
रानीबाग में जिया रानी मेला: कत्यूरी वंशजों ने कुलदेवी की शिला पर टेका मत्था
मकर संक्रांति पर नैनीताल के रानीबाग में कत्यूरी वंशजों का जमावड़ा। गार्गी नदी में स्नान के बाद कुलदेवी जिया रानी की पूजा और रात्रि जागर का आयोजन। जानें इतिहास।
हल्द्वानी। रानीबाग में उमड़ा कत्यूरी वंशजों का जनसैलाब: कुलदेवी जिया रानी की शिला पर की विशेष पूजा
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर नैनीताल जिले का रानीबाग ‘जय जिया’ के जयकारों से गूंज उठा। पर्व से ठीक एक दिन पहले उत्तराखंड के विभिन्न कोनों से कत्यूरी राजवंश के वंशज अपनी कुलदेवी जिया रानी की पूजा-अर्चना के लिए यहां पहुंचे। रानीखेत, द्वाराहाट, पौड़ी और रामनगर जैसे क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने गार्गी नदी (गौला) में पवित्र स्नान कर अपनी परंपरा का निर्वहन किया।
रानीबाग स्थित चित्रशाला घाट पर कत्यूरी वंशजों के लिए यह दिन हरिद्वार के समान ही पवित्र माना जाता है। मान्यता के अनुसार, आम श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन स्नान करते हैं, लेकिन कत्यूरी वंश के लोग एक दिन पहले ही यहां पहुंचकर जिया रानी की गुफा और शिला पर दीप-दान करते हैं। रात्रि में यहां भव्य जागर का आयोजन हुआ, जिसमें केवल राजवंश से जुड़े लोगों ने भाग लिया और देवी से खुशहाली की मनौती मांगी।
इतिहास के पन्नों में जिया रानी का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली रहा है। उनका वास्तविक नाम मौला देवी था और वे हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थीं। कुमाऊं के कत्यूरी राजा प्रीतमदेव से विवाह के बाद उन्हें राजमाता का दर्जा मिला। स्थानीय भाषा में माता को ‘जिया’ कहा जाता है, जिससे वे पूरे अंचल में ‘जिया रानी’ के नाम से विख्यात हुईं।
रानीबाग नाम के पीछे भी एक रोचक इतिहास छिपा है। लोककथाओं के अनुसार, जिया रानी ने इसी क्षेत्र में एक बेहद सुंदर बाग विकसित किया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम रानीबाग पड़ा। आज भी यहां जिया रानी का मंदिर, प्राचीन गुफा और चित्रशिला मौजूद हैं, जो कत्यूरी वंश की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र हैं।
चित्रशाला घाट पर लगने वाला यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह कत्यूरी वंश के बिखरे हुए परिवारों को एक सूत्र में पिरोने का काम भी करता है। गाजे-बाजे के साथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने पूरी रात जागरण कर अपनी समृद्ध लोक संस्कृति को जीवंत रखा। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और पार्किंग के पुख्ता इंतजाम किए थे।
