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देहरादून

देहरादून में कुमाउनी संस्कृति के रंग, कूर्मांचल परिषद का होली मिलन समारोह

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देहरादून के ओएनजीसी केंद्र में कूर्मांचल सांस्कृतिक परिषद ने मनाई होली। बैठकी होली, झोड़ा-चांचरी और पहाड़ी व्यंजनों के साथ बिखरे कुमाऊँ के रंग। देखें पूरी रिपोर्ट।

देहरादून: राजधानी के ओएनजीसी सामुदायिक केंद्र में रविवार को कुमाउनी संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद की ओर से आयोजित ‘होली मिलन समारोह’ में ‘बैठकी होली’ और ‘झोड़ा-चांचरी’ की तानों ने प्रवासी कुमाऊँनी समुदाय को अपनी जड़ों की याद दिला दी। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और परिषद के पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलित कर किया।


इस अवसर पर परिषद की वार्षिक पत्रिका ‘घुघुती’ और नए कैलेंडर का विमोचन भी किया गया। समारोह में लोकगायक मनोज सामंत के गीतों और वाटिका नृत्य एकेडमी के बच्चों की सुंदर प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कांवली, नत्थनपुर और इंदिरा नगर शाखा की महिलाओं ने पारंपरिक ‘बैठकी होली’ के माध्यम से शास्त्रीय रागों की छटा बिखेरी, जबकि प्रेमनगर शाखा की ‘खड़ी होली’ ने माहौल को ऊर्जा से भर दिया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण उप्रेती सिस्टर्स (ज्योति एवं नीरजा) रहीं, जिन्होंने पारंपरिक कुमाउनी धुनों पर समां बांधा। ‘खड़ी होली’ के दौरान भूपाल सिंह नेगी ने भगवान शिव का स्वरूप धरकर प्रस्तुति दी, जिसे देख लोग झूमने पर मजबूर हो गए। इस सांस्कृतिक आयोजन के साथ-साथ कोहिनूर आर्ट ज्वेलर्स द्वारा लकी ड्रॉ का आयोजन भी किया गया, जिसमें विजेताओं को सोने के सिक्के वितरित किए गए।
संस्कृति के साथ-साथ पहाड़ी व्यंजनों का लुत्फ भी इस समारोह की विशेषता रही। अतिथियों और सदस्यों ने पारंपरिक आलू के गुटके, ककड़ी के रायते और सूजी के हलवे का आनंद लिया। इसके अलावा, गढ़ी शाखा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विधायक सविता कपूर ने शिरकत की, जहाँ ‘हमारी पहचान रंगमंच संस्था’ के होलियारों ने शानदार समां बांधा। यहाँ 96 वर्षीय माया देवी सहित कई वरिष्ठ सदस्यों को ‘वृद्ध जन सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार ने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि देहरादून में रह रहे कुमाऊँनी समुदाय के लिए यह मंच एकता और प्रेम का प्रतीक है। अंत में, सभी सदस्यों ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की अग्रिम शुभकामनाएं दीं और अपनी लोक कलाओं को संरक्षित करने का संकल्प लिया।

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