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चौखुटिया: ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन की 42वीं वर्षगांठ की तैयारी, उपपा ने दी हुंकार

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चौखुटिया के आरती घाट पर हुई बैठक में ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन की 42वीं वर्षगांठ भव्य रूप से मनाने का निर्णय। पीसी तिवारी ने व्यवस्था परिवर्तन का आह्वान किया।

चौखुटिया। उत्तराखंड के ऐतिहासिक “नशा नहीं, रोजगार दो” आंदोलन की 42वीं वर्षगांठ को इस बार चौखुटिया में बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी है। आरती घाट पर आयोजित सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और जन-संगठनों की बैठक में इस आयोजन की रूपरेखा तय की गई। आंदोलन के संचालन और कार्यक्रमों के सफल संपादन हेतु एक विशेष संयोजन समिति का गठन भी किया गया है।
व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन आज भी प्रासंगिक
बैठक को संबोधित करते हुए उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने कहा कि यह आंदोलन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की दिशा तय करता है। तिवारी ने जोर देकर कहा कि आज के दौर में यह अभियान पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इस संदेश को पहुंचाएं और राज्य को नई दिशा देने में सहयोग करें।
दो दिवसीय कार्यक्रमों का पूरा शेड्यूल
तय रणनीति के अनुसार, 1 फरवरी 2026 को दोपहर 12 बजे आरती घाट पर उत्तराखंड के वर्तमान संकटों को लेकर एक खुली बैठक होगी। इसके बाद 2 फरवरी को सुबह 10 बजे से चौखुटिया बाजार में विशाल जनजागृति रैली निकाली जाएगी। दोपहर 2 बजे से आम सभा का आयोजन होगा, जिसमें राज्य के ज्वलंत मुद्दों पर भविष्य की रणनीति का ऐलान किया जाएगा।
नशा और बेरोजगारी पर वक्ताओं ने जताई चिंता
बैठक में वक्ताओं ने सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि राज्य गठन के 25 वर्षों बाद भी उत्तराखंड नशामुक्त होने के बजाय नशायुक्त हो गया है। खेती-किसानी की बदहाली और ठेकेदारी प्रथा ने युवाओं का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। अंकिता भंडारी प्रकरण, गैरसैंण राजधानी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों पर भी सभी संघर्षशील ताकतों को एकजुट होने का आह्वान किया गया।
प्रमुख पदाधिकारियों की उपस्थिति
शिक्षाविद आनंद किरौला की अध्यक्षता में संपन्न हुई इस बैठक का संचालन जमन सिंह मनराल ने किया। बैठक में गैरसैंण राजधानी बनाओ संघर्ष समिति के नारायण सिंह बिष्ट सहित दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन अनिवार्य है।

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