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देहरादून

ऐतिहासिक मौण मेला: अगलाड़ नदी में मछली पकड़ने उतरे हजारों ग्रामीण, जानिए 160 साल पुरानी परंपरा

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उत्तराखंड के जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक मौण मेला धूमधाम से मनाया गया। अगलाड़ नदी में टिमरू का पाउडर डालकर हजारों ग्रामीणों ने पारंपरिक रूप से सामूहिक मछलियां पकड़ीं।

मसूरी। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की एक बेहद अनूठी झलक शनिवार को देखने को मिली। मसूरी के पास जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक ‘राज मौण मेला’ पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और भारी उत्साह के साथ मनाया गया। इस पारंपरिक उत्सव में शामिल होने के लिए मसूरी सहित आसपास के 114 से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीण अगलाड़ नदी के तट पर पहुंचे। सुबह से ही क्षेत्र में उत्सव का माहौल था और ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सजे नजर आए।
इस मेले की शुरुआत शनिवार सुबह करीब 10 बजे अगलाड़ नदी में टिमरू का औषधीय पाउडर डालकर की गई। जैसे ही टिमरू की छाल से तैयार यह प्राकृतिक पाउडर पानी की धारा में बहा, वैसे ही नदी में हजारों लोग एक साथ उतर गए। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी अपने पारंपरिक औजारों जैसे कुंडियाड़ा, फटियाड़ा और जाल के साथ सामूहिक रूप से मछलियां पकड़ते दिखाई दिए। लोक संस्कृति का यह अद्भुत नजारा मौणकोट से लेकर यमुना नदी के संगम तक दिखाई दिया।
स्थानीय निवासियों और इतिहासकारों के अनुसार, इस ऐतिहासिक मौण मेले की शुरुआत वर्ष 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने कराई थी। उस दौर में राजा स्वयं अपनी रानी और लाव-लश्कर के साथ इस अनूठे मत्स्य उत्सव में भाग लेने आते थे। सदियों पुरानी यह सांस्कृतिक विरासत पीढ़ियां बदलने के बाद भी आज भी पूरी तरह जीवंत है। इस मेले को देखने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं।
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा होना है। नदी में डाला जाने वाला टिमरू का पाउडर पूरी तरह से प्राकृतिक जड़ी-बूटी है, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती। इससे मछलियां केवल कुछ समय के लिए अचेत होती हैं, जिससे उन्हें आसानी से पकड़ा जा सके। यह सामूहिक आयोजन क्षेत्र के लोगों के बीच आपसी भाईचारे, सामाजिक एकता और अपनी लोक विरासत को संजोए रखने का एक बड़ा माध्यम है।

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