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देहरादून

एम्स ऋषिकेश में मानवता की मिसाल: 8 दिन की नवजात की मौत के बाद माता-पिता ने किया देहदान

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चमोली निवासी दंपत्ति ने अपनी 8 दिन की नवजात बच्ची की मृत्यु के बाद उसकी देह एम्स ऋषिकेश को दान कर दी। चिकित्सा जगत में इस साहसिक निर्णय की सराहना हो रही है।

ऋषिकेश । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में एक ऐसा वाक्या सामने आया है जिसने चिकित्सा जगत और आम जनमानस को भावुक कर दिया है। चमोली निवासी एक दंपत्ति ने अपनी मात्र 8 दिन की नवजात बच्ची को खोने के बाद, उसकी देह चिकित्सा शोध के लिए दान कर दी। इस साहसिक निर्णय के पीछे माता-पिता की भावना है कि उनकी बच्ची भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई में सहायक बनकर अनगिनत जिंदगियां बचा सके।
चमोली निवासी हंसी देवी और संदीप राम के घर बीते 2 जनवरी को इस बच्ची का जन्म हुआ था। बच्ची की आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया) का अभाव था, जिसके कारण उसे श्रीनगर मेडिकल कॉलेज से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया। यहाँ ऑपरेशन के बावजूद रविवार को रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के चलते मासूम ने दम तोड़ दिया। अपने जिगर के टुकड़े को खोने के बाद जहाँ परिवार सदमे में था, वहीं उन्होंने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सर्वोपरि रखा।
एम्स के नर्सिंग स्टाफ और मोहन फाउंडेशन के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा की प्रेरणा से परिवार ने देहदान का मन बनाया। नेत्रदान कार्यकर्ता गोपाल नारंग के सहयोग से देहदान की सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं और मासूम की देह एनाटॉमी विभाग को सौंप दी गई। एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने इस महान कार्य की पुष्टि करते हुए इसे चिकित्सा विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
शिशु के पिता संदीप राम ने नम आंखों से कहा, “हमारा बच्चा इस दुनिया में नहीं रह सका, लेकिन उसका शरीर अन्य मासूमों के जीवन की उम्मीद बन सकता है। मेडिकल छात्र इस पर शोध कर अन्य बच्चों को नई जिंदगी देने की तकनीक सीखेंगे।” यह भावना दर्शाती है कि गहरे दुख के समय भी इंसानियत की ज्योति जलाई जा सकती है।
उत्तराखंड में इतनी कम उम्र के शिशु का देहदान संभवतः पहला या अत्यंत दुर्लभ मामला है। यह घटना समाज को संदेश देती है कि मृत्यु के बाद भी हम दूसरों के जीवन में उजाला बन सकते हैं। एम्स प्रशासन और स्थानीय लोगों ने संदीप राम और उनके परिवार के इस अटूट साहस और संकल्प को नमन किया है।

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