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नई दिल्ली

एक मुक्तक ‘ क्यों ‘

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दुश्मनों को क्यों यहाँ,वो दोस्त बनाकर बैठे हैं।

अपनी आजादी को क्यों,वो गँवाकर बैठे हैं।

क्यों नहीं वो शेर बनकर,अपनी राह चुन रहे।

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अपने आशियाँ को क्यों,जेल बनाकर बैठे हैं।

डॉ. कल्पना कुशवाहा ‘ सुभाषिनी ‘

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