Report by : Paras Bisht
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फूलदेई कल, बच्चों के बगैर सुने हुए अधिकतर गांव

फूलदेई पर बच्चे फूलों से पूजते हैं घर की देहरी, शाम को चावल के आटे के बनते हैं स्ये

फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भरि भकार…त्योहार आज

हल्द्वानी। फूलदेई आज है। संग्रांद पर्व प्रकृति से जुड़ा त्यौहार है। बच्चों की प्रकृति से यह पहली मुलाकात है। कुमाऊँ ओर गढ़वाल में बच्चे फूलों से घर घर जाकर देहली पूजते हैं। त्योहार से जुड़ी कई कहानियां, किवदंतियां, पौराणिकता हैं।

त्योहार बच्चों को अपने लोकगीतों के करीब लाता है। यूं तो चैत्र सक्रांति (15 मार्च) से शुरू यह त्योहार कई जगह अष्टमी (आठवें दिन) और कई जगह 14 अप्रैल को बैशाखी तक मनाया जाता है। त्योहार पर बच्चों की टोली गांव में फूलों की थाल लेकर घर घर पहुंचती हैं। बच्चे शगुन लोकगीत गाते हैं….फूल देई ( देहरी फूलों से भरपूर और मंगलकारी हो), छम्मा देई (देहरी, क्षमाशील अर्थात सबकी रक्षा करे), दैणी द्वार (देहरी, घर व समय सबके लिए दांया अर्थात सफल हो), भरि भकार (सबके घरों में अन्न का पूर्ण भंडार हो)।
बुरांश, सरसों, प्योली, मिझोल, सिलफोड़ के इन फूलों से घर के द्वार की पूजा होती है। बदले में बच्चों को शगुन के तौर पर पैसे देकर गुड़ और मिसरी खिलाई जाती है। फूलदेई पर शाम के समय चावल का स्ये बनाया जाता है। हालांकि गांवों में यह लोक पर्व अब परंपरा तक सिमट गया है। अधिकतर बच्चे पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर शहर चले गए हैं।

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