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उत्तराखण्ड

अब सैन्य धाम के लिए भी जाना जायेगा उत्तराखंड: सीडीएस

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अमर जवान ज्योति की स्थापना दिवस के पर देहरादून पहुंचे सीडीएस जनरल अनिल चौहान 
देहरादून। अमर जवान ज्योति की स्थापना दिवस के अवसर पर सीडीएस जनरल अनिल चौहान देहरादून पहुंचे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड, चीन की सीमा से लगा हुआ राज्य है। राजनीतिक तौर पर हम इसे एक फ्रंटलाइन स्टेट कह सकते हैं पर दुर्भाग्य से इसका आभास बहुत कम लोगों को है। सैन्य व्यवहार और परम्पराएं यहां के जीवन में व्यवहारिक रूप से शामिल हैं। हमें यहां के निवासियों में इस बात का प्रचार करना चाहिए।
आज मेरे लिए बड़े सम्मान और गर्व की बात है कि मुझे ‘अमर जवान ज्योति’ की स्थापना के ऐतिहासिक अवसर में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ये अवसर इसलिए भी गौरवपूर्ण है क्योंकि अमर जवान ज्योति की नींव में प्रदेश के 1734 शहीदों के आंगन की मिट्टी समाहित की जा रही है। साथ ही इस जगह पर प्रदेश की 28 नदियों का जल भी लाया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा में सशस्त्र बलों का बड़ा योगदान रहा है पर मेरे विचार से राष्ट्रीय सुरक्षा व राष्ट्र निर्माण को लेकर हम सब देशवासियों की बराबर जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भविष्य में किस तरह के नौजवान सामने आएंगे ये इस बात पर निर्भर है कि हम अपने पूर्व सैनिकों और शहीदों का किस तरह से सम्मान करते हैं। इस दिशा में विचार करने के लिए और सैन्य धाम बनाने के लिए मैं सशस्त्र बलों की ओर से राज्य सरकार तथा उत्तराखंड के सभी नागरिकों का धन्यवाद देता हूं।
अभी तक शहीदों की यादगार के रूप में केवल युद्ध स्मारक बनाए जाते हैं। इसका किसी आध्यामिक स्थान के रूप में निर्माण कभी नहीं किया गया। यह काम सबसे पहले देवभूमि उत्तराखंड में हुआ है। इस बात का हम सबको गर्व होना चाहिए। उत्तराखंड चार धामों के लिए प्रसिद्ध है लेकिन अब इसे सैन्य धाम के लिए भी जाना जाएगा।
सैन्य धाम के माध्यम से उत्तराखंड के लोग ने अपने सैनिकों को अमर बना दिया है और ये सुनिश्चित किया है कि उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के दिल और दिमाग में बनी रहे। यह पवित्र स्थान न केवल युद्धभूमि में वीरगति पाने वाले सैनिकों का सम्मान करता है बल्कि उनको भी सम्मान देता है जिन्होंने आपदा प्रबंधन में अपने प्राणों की आहुति दी।
उत्तराखंड को देवभूमि के तौर पर जाना जाता है। जहां देवी-देवताओं का वास है लेकिन सशस्त्र बलों में उत्तराखंड के सैनिकों की संख्या को अगर देखा जाए तो इसे सैन्य भूमि भी कहा जा सकता है। इसका कारण यहां के नागरिकों का सैन्य परंपराओं के प्रति लगाव है।
प्राचीन काल से ही उत्तराखंड के वीरों ने मानवता व राष्ट्र की सुरक्षा करते हुए अपार साहस के दम पर विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाई है। वैदिक युग से इस पावन भूमि पर तपस्या करने वाले ऋषियों की रक्षा करने से लेकर वर्तमान समय में भी यहां के सैनिकों की रण में सम्मानजनक उपस्थिति रही है।

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