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हरिद्वार

कवियों के मधुर स्वरों ने किया ऋतुराज का स्वागत

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हरिद्वारा। परिक्रमा साहित्यिक मंच के स्थापना दिवस पर संस्था द्वारा शिवालिक नगर स्थित सामुदायिक केन्द्र में आयोजित एक वासंती काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें भाग लेने पधारे अनेक सिद्धहस्त तथा नवोदित युवा कवि एवं कवियित्रियों ने ऋतुराज बसंत के स्वागत में मधुर स्वर छेड़े, तो वहीं दूसरी ओर श्रृंगार रस भी ख़ूब जमा।


     वयोवृद्ध अनुभवी कवि पं. ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ की अध्यक्षता तथा संस्था सचिव शशि रंजन समदर्शी के कुशल संचालन के इस गोष्ठी का आरम्भ वीणापाणी माँ सरस्वती के विग्रह के सम्मुख दीप प्रजज्वलन व पुष्पार्पण तथा राज कुमारी राजेश्वरी की वाणी वंदना से हुआ। गोष्ठी में ऋतुराज बसंत की आगवानी गीतकार भूदत्त शर्मा ने ‘ऋतुराज के शुभ स्वागतम् की हो रही तैयारियाँ’ तथा देवेन्द्र मिश्र ने ‘स्वागत है ऋतुराज तुम्हारा आओ जल्दी तुम आ जाओ’
के साथ की, तो वरिष्ठ कवि कुंअरपाल सिंह ‘धवल’ ने ‘अब वसंत आने वाला है, नवजीवन लाने वाला है’ का उद्घोष किया।
     कवि अरुण कुमार पाठक ने ‘लोग बिछड़े मगर वो मिले भी तो हैं, दीप जलने से पहले खिले भी तो हैं’ कह कर निराश लोगों‌ के दिलों‌ में आशाओं के दीप जलाए। कवियित्री कंचन प्रभा गौतम ने ‘जीवन रूपी दुर्गम वनों में खड़ी हुई वो, खुद तो थी कहीं बिल्कुल सोई हुई वो’ के साथ वर्तमान सामाजिक परिवेश में नारी मन की जिजीविषा की सटीक तस्वीर खींची।
‌‌‌      डा. कल्पना कुशवाहा ‘सुभाषिनी’ ने ‘आज फिर ऋतुराज आया, दो दिलों को पास लाया’, सुनीता गोयल ने ‘टूटे हुए तारों से फूटे वसंती स्वर’, प्रभात रंजन ने ‘कुछ प्रीत लिखो या गीत लिखो बस तुझको ही मनमीत लिखूँ’, राजकुमारी राजेश्वरी ने ‘कलियाँ मधुबन में भावनाओं से पूछें’ और मदन सिंह यादव ने     
‘इस ऋतु की शान निराली है, हर दिशा हुई मतवाली है’ सुना कर वासंती ऋतु के विभिन्न गुण-प्रभावों का मुखरित चित्रण किया। महेन्द्र कुमार ने तो एक कदम आगे बढ़ कर चैत्र नववर्ष की बात की।
      अभिनंदन रस में ‘मधुर स्वरों की माया से माँ, मेरा घर संसार बना’, कुसुमाकर मुरलीधर पंत ने ‘नादान है अगर वह, नादान रहने दो’, चित्रा शर्मा ने ‘जीवन भी क्या रंग दिखाए’, कर्मवीर सिंह (बिजनौर) ने ‘जय जवान जय किसान, जय विज्ञान है अनुसंधान तेरी जय रहे भारत महान है’, शशि रंजन समदर्शी ने ‘जिसके संग में गा लेते हैं, बिन सोचे हर गीत, माथे का बल पढ़ लेता है जो अपना मीत’, सुभाष मलिक ने ‘मैं तुम्हारे शहर में एक घर बनाना चाहता हूँ’, तथा ब्रजेन्द्र हर्ष ने ‘तू प्रवास पर है दुनिया में, अपना नाम प्रवासी रख ले’ जैसी विविध विधाओं व रंगों‌ की काव्य वर्षा कर खूब तालियाँ बटोरी। गोष्ठी का समापन वरिष्ठतम कवि व काव्य व्याकरणविद् पं. ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ ने गोष्ठी में प्रस्तुत रचनाओं‌ की समीक्षा करते हुए कहा, ‘खोल दो द्वार माँ शानदति धारा बहे, भावना शब्द की छंद से प्रोत हो’।

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