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नई दिल्ली

साँप के संँपोलिये छोड़े नहीं जाते

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आस्तीन में पलने वालों,
बोलो कितना और पलोगे?
मूंग वक्ष पर दलने वालों,
बोलो कितना और दलोगे?
बाहर से दिखते हो चंगे,
पर भीतर से सुलग रहे हो।
बिना बात के जलने वालों,
बोलो कितना और जलोगे?

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रिश्ते अग़र हों खास तो तोड़े नहीं जाते
हर किसी से तार भी जोड़े नहीं जाते
अपना कहें और पीठ पीछे घात भी करें
तो साँप के सँपोलिये छोड़े नहीं जाते।

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देवेश द्विवेदी ‘देवेश‘

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