नई दिल्ली
वक्त
जिन्दगी का एक लम्हा,आज फिर निकल गया।
वक्त था आया हाँथ में,पर रेत सा फिसल गया।
हैं हसरतें जो दिल में, आज भी तुझसे सनम।
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ये फासला ही उसे, देखो नाग सा निगल गया।
डॉ. कल्पना कुशवाहा ‘ सुभाषिनी ‘
