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नई दिल्ली

अल्मोड़ा आए और “चंदा” का मॉलपुवा नहीं खाया तो क्या खाया…

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“मॉलपुवा मैन ऑफ अल्मोड़ा” के नाम से मशहूर हैं चंदन खोलिया
अल्मोड़ा। मॉलपुवा…नानी-दादी की कहानियों में अधिकतर लोगों ने मॉलपुवा का जिक्र सुना होगा। नई पीढ़ी को इसका स्वाद और बनता कैसे है ये भी पता नहीं होगा। लेकिन अल्मोड़ा में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक मॉलपुवा से वाकिफ हैं। इसकी वजह मॉलपुवा मैन ऑफ अल्मोड़ा चंदन (चंदा) खोलिया हैं। अल्मोड़ा में बाल मिठाई की तरह चंदा का मॉलपुवा भी लोगों के मुंह में मिठास और रिश्तों में अपनत्व का अहसास घोलता है।

मालपुआ

बच्चों से लेकर बुजुर्ग मॉलपुवा के दीवाने
अल्मोड़ा शहर में हल्द्वानी की ओर से प्रवेश करते ही करबला में चंदन खोलिया दुकान चलाते हैं। करबला अल्मोड़ा का प्रवेश द्वार है। चंदा सुबह-सुबह गर्मागर्म मॉल पूवे बनाते नजर आते हैं। चंदा के हाथों से बने और चासनी में डुबोए मालपूवा का हर कोई दीवाना है। दुकान में जलेबी भी बनाते हैं लेकिन मॉलपुवा के स्वाद का कोई जवाब नहीं है। चंदा मंद मंद मुकुराहट के साथ अपने हाथों के स्वाद से अपनत्व का अहसास भी कराते हैं।
अल्मोड़ा के जयमित्र सिंह बिष्ट बताते हैं, चंदन खोलिया को बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक चंदा के नाम से जानता है। चंदा से मतलब बड़े भाई से है। दा किसी के नाम के आगे जोड़ा जाता है उन्हें सम्मान दिया जाता है।

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30 सालों से भी घोल रहा मुंह में मिठास

चंदा इस काम को पिछले तकरीबन 30 वर्ष से कर रहे हैं। और वो बताते हैं ये उनके परिवार की तीसरे पुश्त है जो इस काम में लगी है। चंदा के मशहूर मालपुवों की ख्याति पूरे कुमाऊं में फैली हुई है। लगभग हर जगह के लोग शौक से इनकी दुकान से इन स्वादिष्ठ मॉल पूवों को बागेश्वर, नैनीताल, हल्द्वानी स्थिति अपने घरों को ले जाते हैं। एक जमाने में पहाड़ों में ज्यादातर जगह मिल जाने वाला मॉल पूवा भी अब एक तरह से पहाड़ों से विलुप्त होती भोजन में ही आता है। ऐसे में अल्मोड़ा के चन्दन खोलिया उर्फ चंद ने इसे जिंदा रखने का काम तो किया ही है। साथ ही वो इसके माध्यम से स्वरोजगार की सीख भी दे रहे हैं।

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