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नई दिल्ली

“जो जीता वो सिकन्दर” नहीं विक्रमादित्य’ पढ़ेंगे बच्चे

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विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन ने गुलामी की मानसिकता से आजादी के लिए शुरू की पहल
उज्जैन। बचपन से सभी एक मुहावरा पढ़ते-सुनते आ रहे हैं ‘जो जीता, वही सिकंदर’। लेकिन विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन अब मुहावरे से ‘सिकंदर’ नाम हटाकर ‘सम्राट विक्रमादित्य’ जोड़ रहा है। नया मुहावरा होगा ‘जो जीता, वही सम्राट विक्रमादित्य’। अब यही मुहावरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विद्यार्थियों को पढ़ाएंगे।
कुलपति प्रो. अखिलेश कुमार पांडेय ने हिंदी प्रमुख अखबार जागरण के हवाले से कहा है कि इसके निर्देश सभी विभागाध्यक्ष और प्रोफेसरों को दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि इससे गुलामी की मानसिकता से आजादी मिलेगी। विक्रम विश्वविद्यालय के नाम में संशोधन का प्रस्ताव भी उच्च शिक्षा विभाग को भेजा है। स्वीकृति मिलने पर संशोधित नाम सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय होगा।
कुलपति ने कहा कि सिकंदर हमारे युवाओं के लिए आदर्श व्यक्तित्व नहीं हो सकता। सम्राट विक्रमादित्य हमारे आदर्श हैं, इसलिए मुहावरे में संशोधन कर रहे हैं। कुलपति बोले- गुलामी की मानसिकता से मिलेगी आजादी।
कुलपति अखिलेश पांडे ने कहा कि महान सम्राट थे विक्रमादित्य विक्रमादित्य भारतीय उपमहाद्वीप के परमार राजवंश के सम्राट थे। उनके साम्राज्य में भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा शामिल था, जो पश्चिम में वर्तमान सऊदी अरब से लेकर पूर्व में वर्तमान चीन तक फैला हुआ था। इसकी राजधानी उज्जैन थी। वह ज्ञानी, वीर, उदारशील थे। इतिहास के पन्नों में वह सबसे लोकप्रिय और न्यायप्रिय राजाओं में से एक माने गए हैं। मालवा में विक्रमादित्य के भाई राजा भर्तृहरि का शासन था। भर्तृहरि के शासनकाल में शकों का आक्रमण बढ़ गया था। भर्तृहरि ने वैराग्य धारण कर जब राज्य त्याग दिया, तो विक्रम सेना ने शासन संभाला। उन्होंने ईसा पूर्व 57-58 में शकों को खदेड़ा। इसी की याद में उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत कर राज्य के विस्तार का आरंभ किया।

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