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नई दिल्ली

उत्तराखंड: नगर निकायों की योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए बनेगा वाटर सेनिटेशन मिशन, डीएम की अध्यक्षता में जांच होगी

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देहरादून। अब नगर निकायों में बनने वाली जल, सीवर और अन्य विकास योजनाओं में जनता की जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए शासन ने सभी योजनाओं के लिए सख्त नियम तय कर दिए हैं। नई व्यवस्था के तहत केंद्र और वाह्य सहायतित योजनाओं के प्रस्तावों को अब सीधे शासन में भेजने से पहले जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित डिस्ट्रिक्ट वाटर सेनिटेशन मिशन कमेटी (डीडब्ल्यूएसएम) की जांच और संस्तुति अनिवार्य कर दी गई है।

शहरी विकास विभाग के सचिव की ओर से इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं और ये आदेश तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिए गए हैं। आदेश के अनुसार, डीडब्ल्यूएसएम पहले यह सुनिश्चित करेगी कि प्रस्तावित योजना की वास्तव में जरूरत है या नहीं। इसके लिए योजना का परीक्षण किया जाएगा और तय मानकों पर खरा उतरने के बाद ही इसे हरी झंडी दी जाएगी।

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क्यों पड़ी जरूरत
दरअसल, निकाय क्षेत्रों में जलापूर्ति, सीवरेज और अन्य विकास कार्यों को लेकर अक्सर शिकायतें आती रहती हैं कि योजनाएं जरूरत के मुताबिक नहीं बनाई जाती हैं। कहीं जरूरत से ज्यादा खर्च कर दिया जाता है, तो कहीं जहां विकास कार्यों की दरकार होती है, वहां योजना बनती ही नहीं। कई बार सिफारिश के आधार पर भी योजनाएं ऐसी जगह बनाई जाती हैं जहां उनकी आवश्यकता ही नहीं होती। शासन ने इन गड़बड़ियों को रोकने और पारदर्शिता लाने के लिए अब योजना प्रस्तावों के परीक्षण की यह व्यवस्था की है।

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आगे क्या होगा
नई व्यवस्था के तहत अब सीवर और पेयजल सहित किसी भी योजना का प्रस्ताव सबसे पहले नगर निकाय द्वारा डीडब्ल्यूएसएम को प्रस्तुत किया जाएगा। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद प्रस्ताव स्टेट वाटर सेनिटेशन मिशन कमेटी (एसडब्ल्यूएसएम) को भेजा जाएगा। दोनों स्तरों पर सहमति के बाद ही प्रस्ताव शहरी विकास निदेशालय के माध्यम से सरकार के पास भेजे जाएंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस व्यवस्था से निकायों की योजनाओं में पारदर्शिता आएगी और जनता की जरूरतों के मुताबिक ही कार्य होंगे। साथ ही निकाय स्तर पर भ्रष्टाचार पर भी रोक लगेगी। शासन ने अधिकारियों को आदेश का कड़ाई से अनुपालन कराने के निर्देश भी दिए हैं।

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