अल्मोड़ा/बागेश्वर/चंपावत/पिथौरागढ़
जागेश्वर धाम: प्राचीन परंपरा के अनुसार 2.5 क्विंटल घी से ढका गया ज्योतिर्लिंग, दर्शन के लिए उमड़ी भीड़
अल्मोड़ा के जागेश्वर धाम में शुरू हुई प्राचीन घृत गुफा परंपरा। 2.5 क्विंटल घी से ढके गए महादेव, मकर संक्रांति तक गुफा में तपस्या करेंगे भगवान शिव। जानें पूरी खबर।
अल्मोड़ा। उत्तराखंड के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम (Jageshwar Dham) में बुधवार को एक अनोखी और प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया गया। यहाँ भगवान भोलेनाथ के ज्योतिर्लिंग को ढाई क्विंटल शुद्ध गाय के घी से पूरी तरह ढक दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति से भगवान शिव एक महीने के लिए ‘घृत गुफा’ में तपस्या में लीन हो जाते हैं।
पुजारियों ने बताया कि इस प्रक्रिया के लिए सबसे पहले गाय के घी को खौलते पानी में उबालकर शुद्ध किया गया। इसके बाद इसे शिवलिंग पर लेप कर एक गुफा का स्वरूप दिया गया। इस घृत गुफा (Ghee Cave) परंपरा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। माना जाता है कि भगवान शिव के इस स्वरूप के दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
इस भव्य आयोजन के दौरान महामंडलेश्वर कैलाशानंद महाराज और मंदिर के मुख्य पुजारियों सहित कई आचार्य मौजूद रहे। कड़ाके की ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। भक्तों ने स्थानीय नदियों के संगम पर पवित्र स्नान किया और सुबह से ही मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना के लिए लंबी कतारें लगी रहीं।
इसी अवसर पर जागेश्वर धाम के ब्रह्माकुंड के समीप एक सामूहिक जनेऊ संस्कार (Janeu Sanskar) का भी आयोजन हुआ। इसमें 100 से अधिक बटुकों का वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संस्कार दीक्षा संपन्न कराई गई। मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे ताकि दर्शनार्थियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
यह घृत गुफा अब अगले एक महीने तक भक्तों के आकर्षण का केंद्र बनी रहेगी। संक्रांति के दिन शिवलिंग को भक्तों के लिए दोबारा खोला जाएगा। जागेश्वर के अलावा जिले के अन्य मंदिरों जैसे चितई गोलू देवता मंदिर में भी सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहा और यज्ञ कर सुख-शांति की कामना की गई।
