नैनीताल
नैनीताल में भीषण ओलावृष्टि से सेब और आड़ू की फसलें बर्बाद किसानों ने मांगा मुआवजा
नैनीताल के भीमताल, धारी, रामगढ़ और ओखलकांडा में भारी ओलावृष्टि से सेब, आड़ू और सब्जियों को भारी नुकसान हुआ है। प्रभावित किसानों ने तुरंत मुआवजे की मांग की है।
नैनीताल। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की बेरुखी ने एक बार फिर अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है। नैनीताल जिले के भीमताल, धारी, रामगढ़ और ओखलकांडा विकासखंडों में हुई भीषण ओलावृष्टि ने किसानों की सालभर की कड़ी मेहनत को चंद पलों में मटियामेट कर दिया। इस प्राकृतिक आपदा के कारण क्षेत्र में सेब, आड़ू, नाशपाती और प्लम जैसी नकदी फसलों के साथ-साथ मौसमी सब्जियों को भारी नुकसान पहुंचा है।
पहाड़ में फल पट्टी के रूप में मशहूर रामगढ़ और धारी क्षेत्र के बागवान इस तबाही से बेहद मायूस हैं। पेड़ों पर तैयार हो रहे सेब और आड़ू ओलों की मार से टूटकर जमीन पर बिखर गए हैं। ओलावृष्टि का वेग इतना तेज था कि फलों के साथ-साथ पौधों की टहनियों और पत्तियों को भी गंभीर क्षति पहुंची है, जिससे आगामी सीजन की फसल की उम्मीदें भी धुंधली हो गई हैं।
अक्सर देखा जाता है कि चुनाव के समय राजनीतिक दल किसानों के विकास और कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। परंतु, जब ऐसी विकट प्राकृतिक आपदा किसानों की खून-पसीने की कमाई को उजाड़ देती है, तब वे खुद को असहाय महसूस करते हैं। धरातल पर संकट के इस समय में कागजी दावों के बजाय प्रभावित काश्तकारों को तत्काल आर्थिक राहत और उचित मुआवजे की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है।
क्षेत्र के किसानों और स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने उत्तराखंड सरकार और जिला प्रशासन से इस संकट की घड़ी में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। प्रभावित क्षेत्रों का बिना किसी देरी के तुरंत मौका-मुआयना और सर्वे कराया जाना चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह नुकसान का वास्तविक और पारदर्शी आंकलन करे, ताकि वास्तविक रूप से पीड़ित किसानों तक शीघ्र अति शीघ्र उचित मुआवजा राशि पहुंचाई जा सके।
यह समझना बेहद जरूरी है कि किसान केवल चुनाव में इस्तेमाल होने वाला कोई वोट बैंक नहीं है। किसान इस राज्य की असली पहचान और उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ हैं। यदि आज संकट के इस दौर में उनके साथ न्याय नहीं हुआ और समय पर मदद नहीं मिली, तो यह केवल किसानों का व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की आर्थिकी की बड़ी हार होगी।
