देहरादून
ऋषिकेश एम्स में पहली बार लिवर ट्रांसप्लांट, ब्रेन डेड युवती ने दी दो लोगों को नई जिंदगी
ऋषिकेश एम्स में 25 वर्षीय ब्रेन डेड युवती के अंगदान से इतिहास रचा गया। संस्थान में पहली बार लिवर ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई, जबकि 23वां किडनी प्रत्यारोपण सफल रहा।
ऋषिकेश: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सड़क हादसे में ब्रेन डेड घोषित हुई बिजनौर की एक 25 वर्षीय युवती ने अंगदान के जरिए दो गंभीर मरीजों को नई जिंदगी देने की राह खोल दी है। गुरुवार रात संस्थान में युवती के लिवर और किडनी के प्रत्यारोपण की जटिल प्रक्रिया शुरू की गई। खास बात यह है कि एम्स ऋषिकेश के इतिहास में यह पहली बार है जब लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू हुई है।
मिली जानकारी के अनुसार, बिजनौर निवासी युवती 21 अप्रैल को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई थी। सिर में गहरी चोट के कारण उन्हें एम्स लाया गया, जहां उन्हें जीवन रक्षक उपकरणों पर रखा गया। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ और अंततः उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। इसके बाद एम्स प्रशासन ने परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित किया, जिस पर उन्होंने मानवता की मिसाल पेश करते हुए अपनी सहमति दे दी।
संस्थान की निदेशक प्रो. मीनू सिंह और चिकित्सा अधीक्षक प्रो. सत्यश्री के नेतृत्व में 20 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम इस ऑपरेशन को अंजाम दे रही है। इस अंगदान से एक मरीज को लिवर और दूसरे को किडनी प्रत्यारोपित की जा रही है। प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि संस्थान में किडनी ट्रांसप्लांट का यह 23वां सफल मामला है। वहीं, पहली बार लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू होने से उन मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी जो लंबे समय से डोनर और इलाज के इंतजार में थे।
डॉक्टरों के अनुसार, समाज में लिवर संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या बहुत कम है। ब्रेन डेड मरीजों के अंगों का सही समय पर प्रत्यारोपण कई लोगों की जान बचा सकता है। एम्स ऋषिकेश अब लिवर फेलियर से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। इस सफल शुरुआत से आने वाले समय में उत्तराखंड और आसपास के राज्यों के मरीजों को बड़े शहरों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा।
