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उत्तराखण्ड

“पंचाचूली देश” गाने के लोकगायक गणेश मर्तोलिया ने बहन और दादी को खोने के बाद सोशल मीडिया पर बयां किया दर्द, कहा “रात्रि में स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। कृपया अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वयं लें।”

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मैं आज तक हिमालय को सुकीली—स्वर्णिम और सुंदर—कहता आया था, पर अब जब भीतर से टूट चुका हूँ, तब जाकर उसकी असल पीड़ा समझ रहा हूँ। मेरी आत्मा की तरह ही वह भी भीतर से बिखरा, दुखी और बेबस है। पंचचूली की सफेदी अब मेरे लिए कालिख बन चुकी है, और गोरी नदी में मुझे पानी नहीं, बहता हुआ लहू दिखता है। मुन्याल और न्योली पक्षियों की आवाज़ अब गीत नहीं, रोती हुई पुकारें लगती हैं।

मेरी भूली दिया और मयाली नानी की मौत ने मेरी आवाज़ ही छीन ली है—वही आवाज़ जो कभी हिमाल की सुंदरता का गान किया करती थी। अब जब तक इस टूटे-बिखरे पहाड़ की पुकार कोई सुन नहीं लेता, मेरी आवाज़ भी किसी गूंजती चुप्पी में दफ़न रहेगी।

मुनस्यारी के सरकारी अस्पताल में मेरी नानी और बहन ने अपनी आखिरी रात बिताई, पर इलाज नहीं पाया। 24 घंटे तक एक अस्पताल में तड़पते रहना और फिर चुपचाप दम तोड़ देना—ये कोई इंसानी मृत्यु नहीं थी, ये व्यवस्था की बेबसी थी। हम डॉक्टरों और नर्सों को दोष नहीं दे रहे, उन्होंने जो भी साधन और समझ थी, वो इस्तेमाल की, लेकिन वह नाकाफ़ी थी।

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पर मेरा आग्रह है कि इस अस्पताल को “मौत का बंगला” कहने में झिझक ना की जाए। जब रात में मरीजों को देखने के लिए सिर्फ एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो, जिसका काम बस तब शुरू होता है जब कोई तड़पकर दरवाज़ा खटखटाए, तब उस जगह को इलाज का केंद्र नहीं कहा जा सकता।
सरकार और प्रशासन से मेरा एक विनम्र अनुरोध है—कृपया इस अस्पताल के बाहर एक सूचना चिपका दें:
“रात्रि में स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। कृपया अपने जीवन की ज़िम्मेदारी स्वयं लें।”
ताकि अगली बार कोई बहन या नानी झूठे भरोसे में उस दरवाज़े पर अपनी अंतिम साँस न गिनती रहे।
मैं जानता हूँ, यह कोई अकेली घटना नहीं है। इस व्यवस्था ने न जाने कितने लोगों से उनका अंतिम पल छीन लिया होगा। और शायद आगे भी ऐसा होता रहेगा।
भूली दिया, मैं तुमसे अपने कठोर बर्ताव के लिए माफ़ी चाहता हूँ। तुम्हारी परवाह करता रहा, मगर कभी कह नहीं पाया। नानी, तुम्हारे किस्सों, हँसी और साड़ी के रंग में जो जीवन था, वो अब मेरे जीवन से चला गया है।
तुम दोनों जहाँ भी हो, खुश रहना। मेरी दुआ है कि अगले जन्म में तुम्हारी हर अधूरी चाह पूरी हो। इस दुःख की राख में मैं ताउम्र जलता रहूँगा… पर तुम्हारी याद में हमेशा प्रार्थना करता रहूँगा।
गणेश मर्तोलिया

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