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‘जखोली की आशा’: पारिवारिक दुखों और संघर्षों को मात देकर डॉ. आशा ने पेश की कामयाबी की मिसाल
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की डॉ. आशा की प्रेरक कहानी। पिता और पिताओं समान दो चाचाओं के निधन के बाद भी कैसे एक पहाड़ी बेटी ने एमबीबीएस कर अपने गाँव में सेवा का संकल्प पूरा किया।
जखोली (रुद्रप्रयाग): देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों की ऊंचाइयों में केवल बर्फ और जंगल ही नहीं, बल्कि संघर्ष और सफलता की अद्भुत कहानियां भी छिपी हैं। ऐसी ही एक कहानी रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लॉक की डॉ. आशा की है। एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी आशा ने न केवल व्यक्तिगत तानों को अपनी ताकत बनाया, बल्कि परिवार में हुए एक के बाद एक तीन असमय देहांतों के बावजूद अपने ‘डॉक्टर’ बनने के सपने को टूटने नहीं दिया।
एक तंज ने बदली जिंदगी की दिशा
डॉ. आशा की सफलता की नींव बचपन के एक छोटे से आघात पर टिकी है। जब वे 7वीं कक्षा में थीं, तब एक सहपाठी ने उन्हें ताना दिया था कि वे कभी होशियार बच्चों की श्रेणी में नहीं आ सकतीं। इस बात ने आशा के भीतर ऐसी ऊर्जा भरी कि उन्होंने अपनी मेहनत दोगुनी कर दी। परिणामस्वरूप, उन्होंने न केवल कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, बल्कि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में भी शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
पारिवारिक दुखों का पहाड़ और अटूट संकल्प
डॉ. आशा का सफर कांटों भरा रहा। जब वे अपनी मेडिकल की तैयारी और पढ़ाई कर रही थीं, तब उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। साल 2017 में उनके बड़े चाचा, 2019 में उनके पिता और फिर 2024 में छोटे चाचा का असमय निधन हो गया। परिवार के तीन मुख्य स्तंभों के ढह जाने के बाद भी आशा ने हिम्मत नहीं हारी। उनके संयुक्त परिवार के समर्थन और दादा-दादी के आशीर्वाद ने उन्हें पढ़ाई जारी रखने का हौसला दिया।
अपनी ही माटी में सेवा का संकल्प
वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान, श्रीनगर से एमबीबीएस की उपाधि लेने के बाद डॉ. आशा ने आज अपने पैतृक क्षेत्र जखोली में ही चिकित्साधिकारी के रूप में पदभार संभाला है। उनका मानना है कि पहाड़ी समाज, विशेषकर महिलाएं, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहती हैं। वे अब अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने और महिलाओं की कार्यदशाओं को सरल बनाने के लिए काम करना चाहती हैं।
