हरिद्वार
मकर संक्रांति 2026: सूर्य का उत्तरायण काल शुरू, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व
14 जनवरी से सूर्यदेव उत्तरायण होंगे। मकर संक्रांति के साथ ही मांगलिक कार्यों पर लगा ब्रेक हटेगा। जानें क्यों है यह देवताओं का प्रभात काल।
हरिद्वार: भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखने वाला सूर्य का उत्तरायण पर्व इस वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाएगा। छह महीने लंबी दक्षिणायन यात्रा समाप्त कर सूर्यदेव अब उत्तर दिशा की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे। इसी के साथ देश भर में उत्तरायणी पर्वों का आगाज हो जाएगा और माघ मास लगते ही विवाह आदि मांगलिक कार्यों पर लगा प्रतिबंध भी समाप्त हो जाएगा।
पंचांग के अनुसार, बुधवार माघ कृष्ण एकादशी के दिन सूर्यनारायण अनुराधा नक्षत्र में धनु राशि का त्याग कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। 14 जनवरी को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक संक्रांति का पर्वकाल बना रहेगा। शास्त्रीय मान्यता है कि मकर संक्रांति से जाड़ा तिल-तिल घटने लगता है। हालांकि, कड़ाके की ठंड का 40 दिनों का ‘चिल्ला’ 8 फरवरी तक जारी रहेगा, लेकिन सूर्य की किरणों में तेजी आने लगेगी।
मकर संक्रांति को ‘देवताओं का प्रभात काल’ माना जाता है। यह दिव्य समय जुलाई माह के मध्य तक चलता है, जिसके बाद पुनः दक्षिणायन शुरू होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण काल की ही प्रतीक्षा की थी। इस दिन उड़द की दाल और चावल की खिचड़ी खाने और दान करने का विशेष विधान है, जिसे ‘खिचड़ी पर्व’ भी कहा जाता है।
भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, असम में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल (ओणम के साथ संबंधित) के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इसे उत्तरायणी कहा जाता है, जहाँ नदियों में स्नान और दान का बड़ा महत्व है। पंजाब में एक दिन पूर्व ‘लोहड़ी’ का पर्व अग्नि पूजा और गुड़-तिल के साथ मनाया जाता है।
ऋतु परिवर्तन के इस अवसर पर हेमंत ऋतु विदा लेती है और शिशिर ऋतु का आगमन होता है। यह समय न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दौरान तिल और गुड़ का सेवन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इसी दिन प्राचीन काल में गुरुकुलों के विद्यासत्र भी प्रारंभ होते थे, जो इसे ज्ञान और प्रकाश का पर्व सिद्ध करते हैं।
