उत्तराखण्ड
फूलदेई 2026: रंग-बिरंगे फूलों से महकी देवभूमि की देहरियां, शुरू हुआ ‘भिटोली’ का इंतजार
उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व फूलदेई हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बच्चों ने देहरी पूजन कर वसंत का स्वागत किया और इसके साथ ही ‘भिटोली’ माह का भी आगाज़ हुआ।
हल्द्वानी: उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और प्रकृति प्रेम का प्रतीक फूलदेई पर्व रविवार को पूरे प्रदेश में पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। चैत्र मास की पहली तिथि यानी मीन संक्रांति के अवसर पर हिमालय की वादियों में वसंत के आगमन का स्वागत बच्चों की किलकारियों और फूलों की खुशबू के साथ किया गया। सुबह होते ही बच्चे टोकरियों में फ्योंली, बुरांश और सरसों के फूल लेकर घर-घर पहुंचे।
यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक है, बल्कि यह पहाड़ के अटूट प्रकृति प्रेम को भी दर्शाता है। पारंपरिक परिधानों में सजे बच्चों ने घरों की देहरी पर फूल चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान “फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार” के गीतों से देवभूमि के आंगन गूंज उठे। ग्रामीणों ने देहरी पूजन करने आए इन नन्हे मेहमानों को उपहार, गुड़ और चावल भेंट किए।

फूलदेई के साथ ही उत्तराखंड में ‘भिटोली’ माह की भी शुरुआत हो गई है। चैत्र का यह महीना विवाहित बहन-बेटियों के लिए बेहद खास होता है। इस परंपरा के अनुसार, भाई या माता-पिता अपनी विवाहित बेटियों के ससुराल जाकर उन्हें ‘भिटोली’ (उपहार) देते हैं। इसमें घर में बने पारंपरिक व्यंजन, खजूर, मिठाई और नए कपड़े शामिल होते हैं, जो मायके और ससुराल के बीच प्रेम के बंधन को मजबूत करते हैं।
खगोलीय गणना के अनुसार, सूर्य के मीन राशि में प्रवेश करते ही यह उत्सव शुरू होता है। कई जगहों पर बच्चों ने ‘घोघा माता’ की डोली के साथ गांव का भ्रमण किया। लोक पर्व फूलदेई नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। बदलते समय के बावजूद, उत्तराखंड के गांवों और शहरों में इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने का जज्बा आज भी बरकरार है।
प्रकृति और संस्कृति का यह अनूठा संगम हमें सिखाता है कि पर्यावरण का संरक्षण ही असल उत्सव है। बुरांश की लालिमा और फ्योंली के पीले रंग ने पहाड़ की भौगोलिक सुंदरता में चार चांद लगा दिए हैं। भिटोली की रस्म के साथ अब पूरे महीने मायके से आने वाले मेहमानों का इंतजार पहाड़ की हर बेटी को रहेगा।
