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नई दिल्ली

यादें आती हैं…

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बैठ पिताजी के कंधों पर
सारी दुनिया घूम लिया,
जब भी साथ मिला उनका तो
खुशी से मैं तो झूम लिया,
यदि कोई संकट आया तो
हाथ बढ़ा थामा मुझको,
और स्नेह से गले लगाकर
प्यार से माथा चूम लिया।

चंद पलों का सुख दे करके
जीवन भर की पीर लिखी है,

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टेढ़ी-मेढ़ी,आड़ी-तिरछी
कैसी अमिट लकीर लिखी है,

छीन पिता का साया उर में
अकथ वेदना चीर लिखी है,

खाली हाथों में हे ईश्वर
कैसी ये तकदीर लिखी है।

इस जीवन में पुनः मिलेंगे
दिखती ऐसी आस नहीं है,
बिना आपके सब सूना है
दुनिया आती रास नहीं है,
दु:ख की बारिश हमें सताने
घर में अक्सर आ जाती है,
जान गई है वो भी पापा
इनके सिर आकाश नहीं है।

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होठों पर सिसकी आती फरियादें आती हैं,
नई पुरानी भूली बिसरी बाँधे आती हैं,
खोकर तुमको हर पल हमको ऐसा लगता है,
याद नहीं आती है अब तो यादें आती हैं।

देवेश द्विवेदी ‘देवेश’

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