हल्द्वानी
पिथौरागढ़: न्यूरो सर्जन न मिलने से घायल ग्रामीण ने दम तोड़ा, 7 घंटे भटकते रहे परिजन
पिथौरागढ़ में छत से गिरे जनक पाल की इलाज के अभाव में मौत। हल्द्वानी से बरेली तक न्यूरो सर्जन के लिए भटकता रहा परिवार, स्वास्थ्य सुविधाओं की खुली पोल।
हल्द्वानी। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के दावे एक बार फिर खोखले साबित हुए हैं। पिथौरागढ़ जिले के अस्कोट देवल निवासी 45 वर्षीय जनक पाल की सिर में चोट लगने के बाद समय पर इलाज न मिलने से मौत हो गई। शनिवार को मकान की छत से गिरने के कारण जनक गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल पिथौरागढ़ ले जाया गया, लेकिन वहां न्यूरो सर्जन की अनुपलब्धता के कारण उन्हें हल्द्वानी रेफर कर दिया गया।
परिजनों का आरोप है कि वे घायल जनक को लेकर साढ़े सात घंटे का सफर तय कर हल्द्वानी पहुंचे, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। हल्द्वानी के दो बड़े निजी अस्पतालों में न्यूरो सर्जन मौजूद नहीं थे, और सरकारी सुशीला तिवारी अस्पताल (STH) में भी न्यूरो के मरीजों को भर्ती करने से मना कर दिया गया। इसके बाद मजबूर होकर परिजन रात के अंधेरे में ही उन्हें बरेली लेकर रवाना हुए।
साढ़े सात घंटे के लंबे सफर और इलाज के लिए दर-दर भटकने के बाद, रविवार रात करीब 2:00 बजे परिजन बरेली के एक निजी अस्पताल पहुंचे। दुर्भाग्यवश, जब तक अस्पताल में भर्ती करने की प्रक्रिया शुरू होती, जनक पाल ने दम तोड़ दिया। परिजनों का कहना है कि यदि हल्द्वानी या पिथौरागढ़ में ही न्यूरो सर्जरी की सुविधा मिल जाती, तो शायद जनक की जान बच सकती थी।
इस घटना ने एक बार फिर हल्द्वानी और पिथौरागढ़ जैसे प्रमुख केंद्रों पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों में प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश है। यह मामला दर्शाता है कि आज भी पहाड़ के गंभीर मरीजों के लिए ‘रेफर’ होना जानलेवा साबित हो रहा है। उचित समय पर चिकित्सा सुविधा न मिलना किसी भी सभ्य समाज के लिए एक बड़ी विफलता है।
