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नई दिल्ली

समझदार का काम नहीं

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सुख के आने पर इतराना
खुश होना और जश्न मनाना,
समझदार का काम नहीं है
दुख पाकर विचलित हो जाना,
दुख का आना,हमें सताना
यह तो बस चलते रहना है,
फिर दुख की काली छाया से
क्या डरना और क्या घबराना?
फिर भी कभी जो मन उदास हो
याद मुझे थोड़ा कर लेना,
तुमको हिम्मत मिल जाएगी
मेरी यह कविता दोहराना।

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देवेश द्विवेदी ‘देवेश’

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