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उत्तराखंड की दो बेटियों की प्रधानी में ऐतिहासिक जीत: प्रियंका नेगी और निकिता बनीं नई उम्मीद की नेता

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उत्तराखंड की पहाड़ियों से दो होनहार बेटियों ने लोकतंत्र के मंच पर इतिहास रचते हुए साबित कर दिया कि युवा महिलाएं अब सिर्फ वोट नहीं देतीं, नेतृत्व भी करती हैं। एक ओर चमोली जिले के कर्णप्रयाग गैरसैंण विकासखंड के मुख्यमंत्री आदर्श गांव सारकोट की कमान 21 वर्ष 3 माह की प्रियंका नेगी ने संभाली है, तो दूसरी ओर अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया ब्लॉक की कोट्यूड़ा ताल क्षेत्र पंचायत सीट से 21 वर्षीय निकिता ने जीत दर्ज कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है।
सारकोट गांव की सबसे कम उम्र की प्रधान बनीं प्रियंका नेगी
चमोली जनपद के सबसे बड़े गांवों में से एक सारकोट में वर्तमान में 300 से अधिक परिवार निवास करते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इसे मुख्यमंत्री आदर्श गांव घोषित किया गया है, जहां मशरूम उत्पादन, पशुपालन, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़े कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। अब इस गांव की बागडोर सबसे कम उम्र की प्रधान प्रियंका नेगी के हाथों में आ गई है।
राजनीति शास्त्र से स्नातक कर चुकी प्रियंका ने 421 मत प्राप्त कर अपनी प्रतिद्वंदी प्रियंका देवी (235 मत) को भारी अंतर से हराया। प्रियंका के पिता राजे सिंह नेगी पहले भी प्रधान रह चुके हैं, और अब बेटी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का संकल्प जता रहे हैं। प्रियंका ने कहा कि उनकी प्राथमिकता गांव की महिलाओं को सशक्त बनाना और विकास योजनाओं को मजबूती से आगे बढ़ाना रहेगा।
कोट्यूड़ा ताल सीट से निकिता की ऐतिहासिक जीत
अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया ब्लॉक की कोट्यूड़ा ताल क्षेत्र पंचायत सीट से निकिता ने 456 वोट पाकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी निशा (415 वोट) को 41 मतों के अंतर से हराया। निकिता बीए की पढ़ाई कर रही हैं और उनकी सोच स्पष्ट है—गांव की महिलाओं को शिक्षित करना, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना और युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ना।
निकिता का कहना है कि आज की लड़कियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं और राजनीति में महिलाओं के लिए अपार संभावनाएं हैं। उनकी यह जीत सैकड़ों ग्रामीण लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई है। वे कहती हैं, “अब महिलाएं सिर्फ मतदाता नहीं, नेतृत्वकर्ता भी बनेंगी।”
युवा महिलाओं का नया राजनीतिक नेतृत्व
प्रियंका और निकिता की जीत केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत में उभरते महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व का प्रतीक है। शिक्षा, सादगी और सेवा की भावना से लैस इन दोनों बेटियों ने यह दिखा दिया कि नई पीढ़ी की सोच और संवेदनशीलता अब गांवों की दिशा और दशा बदल सकती है।
इनकी सफलता उन तमाम युवतियों के लिए प्रेरणा है जो समाज में बदलाव की इच्छाशक्ति रखती हैं। उत्तराखंड की यह दो नई नेता न सिर्फ अपने गांवों का नेतृत्व करेंगी, बल्कि भविष्य की राजनीति को एक नई दिशा देने की क्षमता भी रखती हैं।

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