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हल्द्वानी

कुमाऊं पंचायत चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका: सियासी परिवारों की करारी हार, कई दिग्गजों की साख दांव पर

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हल्द्वानी। कुमाऊं मंडल के पंचायत चुनाव परिणामों ने इस बार सियासी गणित को पूरी तरह उलट-पलट कर रख दिया। मतगणना के दौरान हर राउंड में नए समीकरण बनते-बिगड़ते नजर आए। मतदाताओं ने ऐसा जनादेश दिया कि बड़े से बड़े राजनीतिक विश्लेषक और नेता भी हैरान रह गए। जहां एक ओर कई नए चेहरों ने जीत का परचम लहराया, वहीं दूसरी ओर कई सियासी घरानों की पकड़ ढीली पड़ती दिखी।

सबसे बड़ा झटका सल्ट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक महेश जीना को लगा। उनके बेटे करन जीना को स्याल्दे ब्लॉक की बबलिया क्षेत्र पंचायत सीट से हार का सामना करना पड़ा। करन जीना को अपने राजनीतिक परिवार और पिता की साख का लाभ मिलने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन करन नेगी ने उन्हें 51 वोटों से पराजित कर सबको चौंका दिया। करन नेगी को 304 और करन जीना को 253 वोट मिले, जबकि 12 वोट अवैध घोषित किए गए। यह हार न केवल एक राजनीतिक उत्तराधिकारी की उम्मीदों पर पानी फेर गई, बल्कि जीना परिवार की पकड़ पर भी सवाल खड़े कर गई।

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वहीं, अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना ब्लॉक में भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के मंडल अध्यक्ष संतोष कुमार राम और उनकी पत्नी पूजा देवी दोनों को करारी हार का सामना करना पड़ा। संतोष नौगांव सीट से चुनाव मैदान में थे, जहां उन्हें सूरज कुमार ने 267 वोटों से हराकर ब्लॉक प्रमुख की संभावनाओं को खत्म कर दिया। संतोष इतने पिछड़े कि तीसरे स्थान पर खिसक गए। वहीं उनकी पत्नी पूजा देवी भी डूंगरलेख सीट से चुनाव हार गईं, जहां प्रिया चम्याल ने जीत दर्ज की।

बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र में भी बड़ा उलटफेर हुआ। निवर्तमान ब्लॉक प्रमुख गोविंद सिंह दानू किलपारा सीट से केवल सात वोटों के अंतर से चुनाव हार गए। किशन सिंह दानू ने 275 वोट पाकर जीत हासिल की, जबकि गोविंद सिंह को 268 वोट मिले। गोविंद की पत्नी किरन दानू भी बदियाकोट सीट से चुनाव हार गईं। उन्हें 304 वोट मिले, जबकि खिलाफ सिंह ने 518 वोटों के साथ बड़ी जीत हासिल की।

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नैनीताल जिले में जिला पंचायत चुनाव में भाजपा को और भी करारा झटका लगा। पार्टी ने 23 सीटों पर प्रत्याशियों को समर्थन दिया था, लेकिन केवल 5 सीटें ही जीत सकी। चार सीटों पर बागी और 15 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी। स्थिति यह रही कि रामनगर की तीन सीटों पर देर रात तक गिनती चलती रही। इस चुनाव में भाजपा के कई मंत्री, विधायक और दायित्वधारी अपनी साख बचाने में नाकाम रहे।

इन नतीजों को 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा को नगर निकाय चुनावों के बाद पंचायत चुनाव में दूसरी बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। यह संकेत है कि जनता अब पार्टी नहीं, प्रत्याशी और काम देखकर फैसला ले रही है।

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