Report by : CWN Desk
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रामनगर में बिजली लाइन ठीक करते वक्त करंट लगने से आउटसोर्स कर्मी की मौत

रानीखेत में स्ट्रेचर न मिलने से घायल बुजुर्ग की मौत हुई तो लमगड़ा में एंबुलेंस खराब होने से नवजात ने तोड़ा दम। कुमाऊं में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल।

अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं का खौफनाक चेहरा एक बार फिर सामने आया है। रानीखेत और लमगड़ा में सरकारी अस्पतालों की घोर लापरवाही और संसाधनों की कमी के चलते दो लोगों की जान चली गई। रानीखेत के उप जिला अस्पताल में समय पर स्ट्रेचर न मिलने से एक घायल बुजुर्ग ने दम तोड़ दिया, तो वहीं लमगड़ा में एंबुलेंस खराब होने के कारण नवजात को समय पर इलाज नहीं मिल सका।
पहली घटना रानीखेत के मजखाली की है, जहां सोमवार दोपहर बाइक की टक्कर से 65 वर्षीय पूरन सिंह अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। परिजन जब उन्हें उप जिला चिकित्सालय लेकर पहुंचे, तो अस्पताल परिसर में आपातकालीन सेवा के लिए एक स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं था। परिजनों का आरोप है कि घायल बुजुर्ग अस्पताल के बाहर पौने घंटे तक तड़पते रहे। जब तक स्ट्रेचर नसीब हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
दूसरी दिल दहला देने वाली घटना अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा सीएचसी (CHC) से सामने आई है। सांगड़ साहू ग्राम पंचायत निवासी अनिता बोरा ने शनिवार को एक बच्चे को जन्म दिया था। जन्म के तुरंत बाद नवजात को सांस लेने में दिक्कत होने पर डॉक्टरों ने उसे अल्मोड़ा बेस अस्पताल रेफर कर दिया। लेकिन लमगड़ा अस्पताल की 108 एंबुलेंस खराब पड़ी थी। परिजन मजबूरी में निजी वाहन का इंतजाम कर बेस अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक मासूम जिंदगी की जंग हार चुका था।
इन दोनों घटनाओं के बाद से ही स्थानीय ग्रामीणों में स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन के खिलाफ गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर हैं। हादसों और प्रसव के समय मरीजों को समय पर एंबुलेंस या बुनियादी संसाधन नहीं मिल पाते हैं, जिससे आए दिन बेकसूर लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने मामले को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है और दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि दोनों घटनाओं की जांच के निर्देश दे दिए गए हैं। देखना होगा कि आखिर कब तक पहाड़ों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में आम जनता को अपनी जान गंवानी पड़ेगी।

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