Report by : CWN Desk
Published at :
हरीश रावत की किताब “उत्तराखंडियत” में कई खुलासे, बढ़ सकती है सियासी हलचल

गोविंद वल्लभ पंत और एनडी तिवारी से लेकर अपने कार्यकाल की घटनाओं का बयां किया है जिक्र

देहरादून। पूर्व सीएम हरीश रावत की पुस्तक मेरा जीवन लक्ष्य उत्तराखंडियत का शनिवार को देहरादून में विमोचन हुआ। जगद्गुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने विमोचन किया।
हरीश रावत ने किताब में कई राजनैतिक घटनाओं से जुड़े खुलासे किए हैं। किताब में रावत ने कई और घटनाओं की आंखों देखी बयां की है जिस पर सियासी संग्राम छिड़ सकता है।

उत्तराखंड की राजनीति में पांच दशक पूरे कर चुके पूर्व सीएम हरीश रावत की पुस्तक में शुरुआती जीवन से वर्ष 2020 तक के सियासी घटनाक्रम को बयां किया है। साथ ही राज्य को लेकर अपने विजन और बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्य को भी विस्तार से उकेरा है। इसमें सबसे अहम खुलासा पूर्व सीएम एनडी तिवारी को लेकर किया गया है। रावत ने रामपुर तिराहा कांड के बाद का विवरण देते हुए कहा है कि उनके प्रस्ताव पर तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव, उत्तराखंड को केंद्रशासित प्रदेश बनाने पर सहमत थे। इसके लिए उत्तराखंड के नेताओं को बुलाया गया। भूलवश उन्होंने (रावत ने) तिवारी को भी न्योता दे दिया। लेकिन तिवारी पहले ही केंद्र में मंत्री नहीं बनाए जाने से रुष्ट थे। ऐसे में उन्होंने नाम लेते हुए कहा कि गोविंद बल्लभ पंत ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से कहा था कि उत्तर प्रदेश का विभाजन उनकी लाश पर होगा और वो भी ऐसा ही सोचते हैं। ये सुनते ही निराश राव बैठक से चले गए। बैठक नरसिम्हा राव मुर्दाबाद के नारों के साथ खत्म हुई। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि जब पीएम आवास में कांग्रेसजनों ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष व प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की थी
पुस्तक में वर्ष 2016 में उत्तराखंड में लगे राष्ट्रपति शासन पर चार अध्याय लिखे गए हैं। रावत ने लिखा कि हरिद्वार जिले के एक विधायक के घर से पूर्ण भुगतान की सूचना आने से आधे घंटे पहले तक उनसे जिलाधिकारी को जरूरी निर्देश दिलवा रहे थे। इसी तरह एक विधायक उनके साथ आनंदपूर्वक लंच करके गईं और अपने खास मंत्री की तरफ से डील पूरी होने की सूचना पर थोड़ी देर में पाला बदल गईं। रावत के मुताबिक, तब फौरी राहत के लिए उन्होंने भाजपा विधायकों को कुछ समय के लिए सदन से निलंबित करने का प्रस्ताव रखा, जिसे उनके सहयोगियों ने स्वीकार नहीं किया। इस तरह दल-बदल टालने का मौका हाथ से चला गया। इसके चलते बने घटनाक्रम से उनके नाम तीन साल में चार बार मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ।
रावत ने तिवारी के साथ रिश्तों को विस्तार से बताते हुए कहा है कि 1991 तक वो कांग्रेस की राजनीति में काफी आगे बढ़ चुके थे, लेकिन तिवारी के भी प्रिय बने हुए थे। राजीव गांधी की हत्या के बाद मतगणना से पहले पीएम पद की दावेदारी को लेकर तिवारी उनके पास आए, इस दौरान उन्होंने तिवारी से अपनी खुद की और तिवारी की भी संभावित हार की आशंका जाहिर कर दी, यहां से तिवारी का आशीर्वाद उनसे हमेशा के लिए खत्म हो गया। फिर उत्तराखंड बनने के बाद उन्होंने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सहयोगियों के विरोध के बावजूद कांग्रेस भवन उद्घाटन में तिवारी को भी बुलाया। तिवारी को कांग्रेस भवन ऐसा भाया कि वो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ही बन गए।

Follow CWN TODAY on WhatsAppJoin ›