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नैनीताल

हाईकोर्ट ने वन विभाग में आउटसोर्स एजेंसी से माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को नौकरी से हटाने पर अंतरिम रोक लगाई

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हल्द्वानी एफटीआई ने हटाए थे 71 कर्मचारी, 2018 में सीधी नियुक्ति पर लगी थी पाबंदी
नैनीताल। हाईकोर्ट ने वन विभाग में आउटसोर्स एजेंसी से माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को नौकरी से हटाने पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही प्रदेश सरकार को तीन दिन के भीतर स्थिति साफ करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई तीन जनवरी को होगी। गुरुवार को मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ में हुई।
वन विभाग में उपनल सहित अन्य आउटसोर्स एजेंसियों के माध्यम से कुल 2187 लोग काम कर रहे हैं। बीते नौ नवंबर को शासन ने अधिसूचना जारी कर विभाग के पुनर्गठन की तैयारी करने और 1113 पदों को आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से भरने का निर्देश दिया था।
इस आदेश को देहरादून के दिनेश चौहान और अल्मोड़ा के दिनेश परिहार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे पद भी दूसरी आउटसोर्स एजेंसी से भरने के निर्देश दे दिए गए, जिन पर वह कार्यरत हैं। वह वर्षों से विभाग में काम कर रहे हैं और दूसरे लोगों को आउटसोर्स से नियुक्त कर, उनको सेवा से बाहर करना सही नहीं है।
वन विभाग के आउटसोर्स कर्मचारियों को डिविजनों ने हटाना भी शुरू कर दिया था। नवंबर माह में बिना आदेश के ही कुछ डिविजनों ने तमाम आउटसोर्स कर्मचारियों को हटा दिया था। वहीं तीन माह से वेतन नहीं मिलने के कारण कर्मचारी परेशान थे। विभाग के पास उनके लिए बजट नहीं था।
वन विभाग में प्रदेश भर में आउटसोर्स, उपनल व प्रांतीय रक्षक दल (पीआरडी) से लगभग 2,187 कर्मचारी नियुक्त हैं। ये कर्मचारी वन विभाग में में बैरियर्स पर चेकिंग दल, ड्राइवर, फायर वॉचर, बीट वॉचर, कुक, स्वीपर, माली, केयर टेकर, चौकीदार, अर्दली, डाक वाहक, कंप्यूटर ऑपरेटर, डाटा एंट्री ऑपरेटर समेत विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं।
फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी और अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर में तैनात आउटसोर्स के माध्यम से वन कर्मियों को हटा दिया था। इनमें चौकीदार से लेकर लिपिक समेत अन्य पदों पर कार्यरत कर्मचारी शामिल हैं। इन कर्मियों को काफी समय से वेतन भी नहीं मिला रहा था। इस कारण कर्मचारी मुश्किलें झेल रहे थे। इन कर्मचारियों को भी फैसले से बड़ी राहत मिली है।
पूर्व में डीएफओ स्तर पर फायर वॉचर, बीट वॉचर, माली, कुक, स्वीपर वगैरह पर तैनाती हो जाती थी। शासन का मानना था कि इससे मनमानी भर्तियां की जाती हैं। वहीं जरूरतमंद के बजाय चहेतों को भी रखा जाता है। इस पर रोक लगाने के मकसद से वर्ष 2018 में शासनादेश जारी हुआ कि नियुक्तियों के लिए शासन से अनुमति लेना अनिवार्य है। इसके बाद डीएफओ स्तर पर सीधी भर्ती पर रोक लगाई थी।

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